शनिवार, २९ अगस्त २००९

शकुन पद्धति की वैज्ञानिकता


मेरे गॉव में एक बुढ़िया रहती थी। उसके यहॉ शकुन कराने के लिए अक्सर ही लोग आया करते थे। उसके यहॉ लोगों के आवागमन को देखकर मै कौतूहलवश वहॉ पहुंचा , यह जानने की जिज्ञासा के साथ कि यह बुढ़िया आखिर करती क्या है , जिससे इसे सब बातें मालूम हो जाती हैं। उन दिनों मेरी उम्र मात्र 10-12 वर्ष ही रही होगी। यदि कोई विद्यार्थी उसके पास पहुंचता और पूछ बैठता कि वह परीक्षा में पास होगा या नहीं , तो बुढ़िया उसे दूसरे दिन की सुबह बुलाती , उसके आने पर ऑखें बंद कर होठों से कुछ बुदबुदाती , मानो कोई मंत्र पढ़ रही हो। इसके बाद बहुत शीघ्रता से जमीन में कुछ रेखाएं खींचती थी । फिर राम , सीता , लक्ष्मण राम , सीता , लक्ष्मण , के क्रम को दुहराती चली जाती। यदि अंत की रेखा में राम आता तो कहती , अच्छी तरह पास हो जाओगे। यदि अंत में सीता आती , तो पास नहीं हो पाओगे , एक बड़ी अड़चन है। यदि लक्ष्मण आ जातें , तो कहती पास हो जाओगे , किसी तरह पास हो जाओगे।


इसी तरह किसी का कोई जानवर खो गया है , तो वह बुढ़िया से पूछता कि उसका जानवर मिलेगा या नहीं , तो वह जमीन में फटाफट कई रेखाएं खींच देती , फिर उन लकीरों को उसी तरह राम , सीता और लक्ष्मण के नाम से गिनना शुरु कर देती , अंतिम रेखा में रामजी का नाम आया , तो जानवर मिल जाएगा , सीताजी आयी , तो जानवर नहीं मिलेगा , लक्ष्मणजी आए , तो कठिन परिश्रम से जानवर मिल जाएगा। जानवर किस दिशा में मिलेगा , इस प्रश्न के उत्तर में वह फटाफट जमीन पर कई रेखाएं खींचती , पहली रेखा को पूरब , दूसरी रेखा को पिश्चम , तीसरी रेखा को उत्तर और चौथी रेखा को दक्षिण के रुप में गिनती जारी रखती। यदि अंतिम रेखा में पूरब आया , तो जानवर के पूरब दिशा में , पश्चिम आया , तो जानवर के पश्चिम दिशा में , उत्तर आया , तो उसके उत्तर दिशा में तथा दक्षिण आया , तो जानवर के दक्षिण दिशा में होने की भविष्‍यवाणी कर दी जाती। बुढ़िया की इस कार्यवाही में सच कितना होता होगा , यह तो नहीं कहा जा सकता , किन्तु इसे विज्ञान कहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा।


बुढ़िया की शकुन करने की पद्धति अत्यंत सरल है। इससे कौन आदमी कितना लाभान्वित हो सकता है , यह सोंचने की बात है। राम , लक्ष्मण और सीता की गिनती से रेखाओं को गिनना और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचना महज तीन संभावनाओं में से एक का उल्लेख करता है। तीनों संभावनाओं का विज्ञान से कोई वास्ता नहीं , फिर भी गॉव के सरल लोग किसी दुविधा में पड़ते ही व्याकुल होकर उसके पास पहुंचने का क्रम बनाए रहते थे। जो धर्त्‍त या चालाक तरह के लोग होते , वे भी बुढ़िया के पास मनोरंजनार्थ पहुंचते। बुढ़िया अपनी लोकप्रियता से खुश होती थी , कुछ लोग शकुन के बढ़िया होने पर खुश होकर कुछ दे भी देते , पर काफी लोगों के लिए वह उपहास का विषय बनी हुई थी , इस तरह बुढ़िया की शकुन करने की पद्धति विवादास्पद और हास्यास्पद थी।


बुढ़िया की उपरोक्त शकुन पद्धति की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि आज फलित ज्योतिष में शकुन पद्धति को व्यापक पैमाने पर स्थान मिला हुआ है। शकुनी ने तो पांडवों पर विजय प्राप्त करने और अपने भांजे दुर्योधन को विजयी बनाने के लिए किस पाशे का व्यवहार किया था या किस विधि से पाशे फेकता या फेकवाता था , यह अनुसंधान का विषय हो सकता है , जहॉ केवल जीत की ही संभावनाएं थी , लेकिन इतना तो तय है कि जिस पाशे से हार और जीत दोनो का ही निर्णय हो , उसमें संभावनाएं केवल दो होंगी। घनाकार एक पाशा हो , जिसके हर फलक में अलग अंक लिखा हो , जिसके हर अंक का फल अलग-अलग हो , उसकी संभावनाएं 1/6 होंगी। चूंकि प्रत्येक अंक के लिए एक-एक फल लिखा गया है , तो एक पाशे से बारी-बारी से 6 प्रकार के फलों को सुनाया जा सकता है। ऐसे प्रयोगों का परिणाम कदापि सही नहीं कहा जा सकता। मनोरंजनार्थ या लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए शकुन किया जाए , तो बात दूसरी है।


हर रेलवे स्टेशन में तौलमापक मशीनें रहती हैं। उसमें निर्धारित शुल्क डाल देने पर तथा उस मशीन में खड़े होने पर व्यक्ति के वजन के साथ ही साथ उसके भाग्य को बताने वाला एक कार्ड मुफ्त में मिल जाता है। अधिकांश लोग उसे अपना सही भाग्यफल समझकर बहुत रुचि के साथ पढ़ते हैं । इस विधि से प्राप्त भाग्यफल को भी एक प्रकार से लॉटरी से उठा हुआ भाग्यफल समझना चाहिए। जो विज्ञान पर आधृत नहीं होने के कारण कदापि विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। इसलिए इस भाग्यफल को विज्ञान मान्यता नहीं दे सकता।


बड़े-बड़े शहरों में ललाट पर तिलक लगाए ज्योतिशी के रुप में तोते के माध्यम से दूसरों का भाग्यफल निकालते हुए तथाकथित ज्योतिषियों की संख्या भी बढ़ती देखी जा रही है। 25-30 पर्चियों में विभिन्न प्रकार के भाग्यों का उल्लेख होता है। भाग्यफल की जानकारी प्राप्त करने वाला व्यक्ति तोतेवाले को निर्धारित शुल्क दक्षिणा के रुप में देता है , जिसे प्राप्त करते ही तोतेवाला पंडित तोते को निकाल देता है । तोता उन पर्चियों में से एक पर्ची निकालकर अपने मालिक के हाथ में रख देता है , उस पर्ची में जो लिखा होता है , वही उस जिज्ञासु व्यक्ति का भाग्य होता है। तत्क्षण ही एक बार और दक्षिणा देकर भाग्यफल निकालने को कहा जाए , तो प्राय: भाग्यफल बदल जाएगा। इस पद्धति को भी भाग्यफल की लॉटरी कहना उचित होगा। ग्रहों से संबंधित फल कथन से इस भाग्यफल का कोई रिश्ता नहीं।


इसी तरह धार्मिक प्रवृत्ति के कुछ लोगों को रामायण के प्रारंभिक भाग में उल्लिखित श्री रामश्लाका प्रश्नावलि से भाग्यफल प्राप्त करते देखा गया हैं। रामश्लाका प्रश्नावलि में नौ चौपाइयों के अंतर्गत स्थान पानेवाले 25 गुना नौ यानि 225 अक्षरों को पंद्रह गुना पंद्रह , बराबर 225 ऊध्र्व एवं पार्श्‍व कोष्‍ठकों के बीच क्रम से इस प्रकार सजाया गया है कि जिस कोष्‍ठक पर भगवान का नाम लेकर ऊंगली रखी जाए , वहॉ से नौवें कोष्‍ठक पर जो अक्षर मिलते चले जाएं , और इस प्रक्रिया की निरंतरता को जारी रखा जाए , तो अंतत: एक चौपाई बन जाती है , हर चौपायी के लिए एक विशेष अर्थ रखा गया है । भक्त उस अर्थ को अपना भाग्य समझ बैठता है। जैसे- सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजहिं मनकामना तुम्हारी। इसका फल होगा - प्रश्नकर्ता का प्रश्न उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा । इसी तरह एक चौपाई - उधरे अंत न होई निबाहू। कालनेमि जिमि रावण राहू। का फल इस प्रकार होगा- इस कार्य में भलाई नहीं हैं। कार्य की सफलता में संदेह है। इस प्रकार की नौ चौपाइयों से धनात्मक या ऋणात्मक फल भक्त प्राप्त करते हैं। यहॉ भी फल प्राप्त करने की विधि लॉटरी पद्धति ही मानी जा सकती है। धार्मिक विश्वास और आस्था की दृष्टि से रामायण से शकुन कर मन को शांति प्रदान करने की यह विधि भक्तों के लिए सर्वोत्‍तम हो सकती है , परंतु इस प्रकार के एक उत्तर प्राप्त करने की संभावना 1/9 होगी और यह कदापि नहीं कहा जा सकता है कि इसे किसी प्रकार का वैज्ञानिक आधार प्राप्त है। शकुन शकुन ही होता है। कभी शकुन की बातें सही , तो अधिकांश समय गलत भी हो सकती हैं।


घर या अस्पताल में अपना कोई मरीज मरणासन्न स्थिति में हो और उसी समय बिल्ली या कुत्ते के रोने की आवाज आ रही हो , तो ऐसी स्थिति में अक्सर मरीज के निकटतम संबंधियों का आत्मविश्वास कम होने लगता है , किन्तु ऐसा होना गलत है। कुत्ते या बिल्ली के रोने का यह अर्थ नहीं कि उस मरीज की मौत ही हो जाएगी। कुत्ते या बिल्ली का रोने की बेसुरी आवाज वातावरण को बोझिल और मन:स्थिति को कष्‍टकर बनाती है , किन्तु यह आवाज हर समय कोई भविष्‍यवाणी ही करती है या किसी बुरी घटना के घटने का संकेत देती है , ऐसा नहीं कहा जा सकता।


इस तरह कभी यात्रा की जा रही हो और रास्ते के आगे बिल्ली इस पार से उस पार हो जाए , तो शत-प्रतिशत वाहन-चालक वाहन को एक क्षण के लिए रोक देना ही उचित समझते हैं। ऐसा वे यह सोंचकर करते हैं कि यदि गाड़ी नहीं रोकी गयी , तो आगे चलकर कहीं भी दुर्घटना घट सकती है। ऐसी बातें कभी भी विज्ञानसम्मत नहीं मानी जा सकती , क्योकि जिस बात को लोग बराबर देखते सुनते और व्यवहार में लाते हैं , उसे वे फलित ज्योतिष का अंग मान लेते हैं , उन्हें ऐसा लगता है , मानो बिल्ली ने रास्ता काटकर यह भविष्‍यवाणी कर दी कि थोड़ी देर के लिए रुक जाओ , अन्यथा गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगी। कैसी विडम्बना है , रेलवे फाटक पर पहरा दे रहा चौकीदार जब आते हुए रेल को देखकर गाड़ीवाले को रुकने का संकेत करता है , तो बहुत से लोग एक्सीडेंट की परवाह न करते हुए रेलवे कॉसिंग को पार करने को उद्यत हो जाते हैं और बिल्ली के रास्ता काटने पर उससे डरकर लोग गाड़ी रोक देते हैं।


मैं पहले ही इस बात की चर्चा कर चुका हूं कि प्रमुख सात ग्रहों या आकाशीय पिंडों के नाम के आधार पर सप्ताह के सात दिनों के नामकरण भले ही कर दिया गया हो , लेकिन इन दिनों पर संबंधित ग्रहों का कोई प्रभाव नहीं होता है। लेकिन शकुन के लिए लोगों ने इन दिनों को आधार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यथा ` रवि मुख दर्पण , सोमे पान , मंगल धनिया , बुध मिष्‍टान्न। बिफे दही , शुके राय , शनि कहे नहाय , धोय खाय।´ इसका अर्थ हुआ कि रविवार को दर्पण में चेहरा देखने पऱ , सोमवार को पान खाने पर , मंगलवार को धनिया चबाने पर , बुध को मिठाई का सेवन करने पर , बृहस्पतिवार को दही खाने पर , शुक्रवार को सरसों या राई खाने पर तथा शनिवार को स्नान कर खाने के बाद कोई काम करने पर शकुन बनता है , कार्य की सिद्धि होती है। इन सब बातों का कोई वैज्ञानिक पक्ष नहीं है , जिससे फलित ज्योतिष का कोई लेना-देना रहे। जब सप्ताह के दिनों से ग्रहों के प्रभाव का ही कोई धनात्मक या ऋणत्मक सह-संबंध नहीं है , तो इलाज , शकुन या भविश्यफल कथन कहॉ तक सही हो सकता है , यह सोंचनेवाली बात है।


शकुन पद्धति से या लॉटरी की पद्धति से कई संभावनाओं में से एक को स्वीकार करने की प्रथा है। किन्तु हम अच्छी तरह से जानते हैं कि बार-बार ऐसे प्रयोगों का परिणाम विज्ञान की तरह एक जैसा नहीं होता। अत: इस प्रकार के शकुन भले ही कुछ क्षणों के लिए आहत मन को राहत दे दे , भविश्य या वर्तमान जानने की पक्की विधि कदापि नहीं हो सकती। स्मरण रहे , विज्ञान से सत्य का उद्घाटन किया जा सकता है तथा अनुमान से कई प्रकार की संभावनाओं की व्याख्या करके अनिश्चय और निश्चय के बीच पेंडुलम की तरह थिरकता रहना पड़ सकता है , लेकिन इन दोनों से अलग लॉटरी या शकुन पद्धति से अनुमान और सत्य दोनों की अवहेलना करते हुए अंधेरे में टटोलते हुए जो भी हाथ लग जाए , उसे अपनी नियति मान बैठने का दर्द झेलने को विवश होना पड़ता है।

मंगलवार, १४ जुलाई २००९

क्‍या एक ही समय में जन्‍म लेनेवालों का भविष्‍य एक सा होता है ?????

विश्व की कुल आबादी इस समय 7 अरब के आसपास है और उस आबादी का लगभग छठा भाग 1 करोड़ से अधिक केवल भारत में है। परिवार नियोजन के कार्यक्रमों में बढ़ोत्तरी के बावजूद प्रत्येक दस वर्षों में इस समय आबादी 25 प्रतिशत बढ़ती चली आ रही है। अत: यह कहा जा सकता है कि बच्चों का जन्मदर अपने उफान पर है। इस समय प्रत्येक मिनट में भारत में जन्म लेनेवाले बच्चों की संख्या 4 होती है। फिर भी यदि आप किसी बड़े अस्पताल में कुछ दिनों के लिए ठहरकर निरीक्षण करें , तो आप पाएंगे कि शायद ही कोई दो बच्चे किसी विशेश समय में एक साथ उत्पन्न होते हैं। अत: हर बच्चे की मंजिल निश्चित तौर पर भिन्न होगी , चाहे लगन की कुंडली एक जैसी ही क्यों न हो , सारे ग्रहों की स्थिति एक जैसी ही क्यों न हो। कभी-कभी एक ही गर्भ से दो बच्चों का भी जन्म होता है , तथापि जन्मसमय बिल्कुल एक नहीं होता , यही कारण है कि दो जुड़वॉ भाइयों के बीच बहुत सारी समानताओं के बावजूद कुछ विषमताएं भी होती हैं , किन्तु विषमताएं कभी-कभी इतनी मामूली होती हैं कि दोनों के बीच उसे अलग कर पाना काफी कठिन कार्य होता है। हो सकता है , इन मामूली विषमताओं के कारण ही दोनो की मंजिल भिन्न-भिन्न हो , दोनों अलग-अलग व्यवसाय में हों। बहुत बार देखने को ऐसा भी मिलता है कि दो जुड़वॉ भाइयों में से एक जन्म लेने के साथ ही या कुछ दिनों बाद मर गया और दूसरा आजतक जीवित ही है। जो जीवित है , उसकी चारित्रिक विशेषताएं , सोंच-विचार की शैली , उम्र के सापेक्ष ग्रहों की स्थिति और शक्ति के अनुसार ही है , किन्तु जो संसार से चला गया , उसके सभी ग्रहों का फल उस जातक को क्यों नहीं प्राप्त हो सका ? यह बहुत ही गंभीर प्रश्न है।


मैने आयुर्दाय से संबंधित संपूर्ण प्रकरण का अध्ययन किया , उसके नियम-नियमावलि को भी ध्यान से समझने की चेष्‍टा की , किन्तु मुझे कोई सफलता नहीं मिली। गत्यात्मक दशापद्धति से ही एक तथ्य का उद्घाटन करने में अवश्य सफल हुआ कि जब किसी ग्रह का दशाकाल चल रहा होता है , उससे अष्‍टम भाव में लग्नेश विद्यमान हो , तो कुछ लोगो को मृत्यु या मृत्युतुल्य कष्‍ट अवश्य प्राप्त होता है। संजय गॉधी जब 34 वर्ष के थे और मंगल के काल से गुजर रहे थे , जब उनकी मृत्यु हुई। उनकी जन्मकुंडली में धनु राशि के मंगल से अष्‍टम में लगनेश शनि कर्क राशि में स्थित था। इनकी मृत्यु के समय शनि और मंगल दोनो ही ग्रह लग्न से अष्‍टम भाव में गोचर में लगभग एक तरह की गति में मंदगामी थे। इसी तरह एन टी रामाराव शनि के मध्यकाल से गुजर रहे थे , वे 78 वर्ष की उम्र के थे । इनका जन्मकालीन शनि कन्या राशि द्वादश भाव में स्थित था तथा लग्नेश शुक्र शनि के अष्‍टम भाव में मेष राशि में मौजूद था। इसी प्रकार अन्य कई लोगों को भी इस प्रकार की स्थिति में मृत्यु को प्राप्त करते देखा , अत: इसे मौत के परिकल्पित बहुत से कालों में से एक संभावित काल भले ही मान लिया जाए , पूरे आत्मविश्वास के साथ हम मौत का ही काल नहीं कह सकते। इससे भी अधिक सत्य यह है कि मौत कब आएगी , इसकी जानकारी जन्मकुंडली से अभी तक किए गए शोधों के आधार पर मालूम कर पाना असंभव ही है। चाहे जन्मसमय की शुद्धतम जानकारी किसी ज्योतिषी को क्यो न दे दी जाए , मौत के समय की जानकारी दे पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए कठिन होगा ,क्योकि इससे संबंधित कोई सूत्र उनके पास नहीं है। अत: जुड़वे में से एक की मौत क्यो हुई और जीवित के साथ ग्रह किस प्रकार काम कर रहे हैं ? इन दोनों की तुलना का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। एक ज्योतिषीय पत्रिका में ऑस्टेलियाई जुड़वो की ऐसी भी कहानी पढ़ने को मिली , जो 65-66 वर्ष की लम्बी उम्र तक जीने के बाद एक ही दिन बीमार पड़े और एक ही दिन कुछ मिनटों के अंतर से मर गए। दोनों की जीवनशैली , चारित्रिक विशेषताएं , कार्यक्रम सभी एक ही तरह के थे। इतनी समानता न भी हो , फिर भी एक दिन और एक ही लग्न के जातको में कुछ समानताएं तो निश्चित तौर पर होती हैं।



यहॉ एक प्रश्न और भी उठ जाता है कि जिस दिन जिस लग्न में महात्मा गॉधी , जवाहरलाल नेहरु , सुभाशचंद्र बोस , हिटलर , नेपोलियन आदि पैदा हुए थे , उस दिन उस लग्न में क्या कोई और पैदा नहीं हुआ ? यदि पैदा हुआ तो उन्हीं चर्चित लोगों की तरह वह भी चर्चित या यशस्वी क्यों नहीं है ? इस प्रश्न का उत्तर सहज नहीं दिया जा सकता। यदि उत्तर ऋणात्मक हो यानि महात्मा गॉधी जैसे लोगों के जन्म के दिन उसी लग्न की उसी डिग्री में विश्व के किसी भाग में किसी व्यक्ति का जन्म नहीं हुआ , तो उत्तर को विशुद्ध परिकल्पित माना जा सकता है , किन्तु मै इतना तो अवश्य कहना चाहूंगा कि प्रकृति में अति महत्वपूर्ण घटनाएं काफी विरल होती हैं , जबकि सामान्य घटनाओं में निरंतरता बनी होती हैं। शेरनी अपने जीवन मे एक बच्चे को पैदा करती है , उसका बच्चा शेर होता है , जिनकी विशेशताओं और खूबियों को अन्य जीवों में नहीं देखा जा सकता है। अत: शेर के बच्चे के जन्म के समय में जरुर कुछ विशेषताएं रहती होंगी , वह क्षण विरले ही उपस्थित होता होगा। उस क्षण में सियारनी अपने बच्चे को जन्म नहीं दे सकती , क्योंकि सियार के बच्चे एक साथ दर्जनों की संख्या में जन्म लेते हैं और इसलिए इनके बच्चों की विशेषताओं को असाधारण नहीं कहा जा सकता। इनका जन्म सामान्य समय में ही होगा। इसी तरह महापुरुषों के आविर्भाव के काल में ग्रहो की विशेश स्थिति के कारण जन्म-दर में विरलता रहती होगी। महापुरुषों के जन्म के समय किसी सामान्य पुरुष का जन्म नहीं हो सकता है। एक साथ दो भगवान के अवतार की गवाही इतिहास भी नहीं देता। मेरी इन बातों को यदि आप कोरी कल्पना भी कहें , तो दूसरी बात जो बिल्कुल ही निश्चित है , एक लग्न और एक लग्न की डिग्री में महत्वपूर्ण व्यक्ति का जन्म एक स्थान में कभी नहीं होता। यदि किसी दूरस्थ देश में किसी दूसरे व्यक्ति का जन्म इस समय हो भी , तो आक्षांस और देशांतर में परिवर्तन होने से उसके लग्न और लग्न की डिग्री में परिवर्तन आ जाएगा। फिर भी जब जन्म दर बहुत अधिक हो , तो या बहुत सारे बच्चे भिन्न-भिन्न जगहों पर एक ही दिन एक ही लग्न में या एक ही लग्न डिग्री में जन्म लें , तो क्या सभी के कार्यकलाप , चारित्रिक विशेशताएं , व्यवसाय , शिक्षा-दीक्षा , सुख-दुख एक जैसे ही होंगे ?



मेरी समझ से उनके कार्यकलाप , उनकी बौद्धिक तीक्ष्णता , सुख-दुख की अनुभूति , लगभग एक जैसी ही होगी। किन्तु इन जातकों की शिक्षा-दीक्षा , व्यवसाय आदि संदर्भ भौगोलिक और सामाजिक परिवेश के अनुसार भिन्न भी हो सकते हैं। यहॉ लोगों को इस बात का संशय हो सकता है कि ग्रहों की चर्चा के साथ अकस्मात् भौगोलिक सामाजिक परिवेश की चर्चा क्यो की जा रही है ? स्मरण रहे , पृथ्वी भी एक ग्रह है और इसके प्रभाव को भी इंकार नहीं किया जा सकता। आकाश के सभी ग्रहों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है , परंतु भिन्न-भिन्न युगों सत्युग , त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग में मनुष्‍यों के भिनन-भिन्न स्वभाव की चर्चा है। मनुष्‍य ग्रह से संचालित है , तो मनुष्‍य के सामूहिक स्वभाव परिवर्तन को भी ग्रहों से ही संचालित समझा जा सकता है , जो किसी युग विशेष को ही जन्म देता है। लेकिन सोंचने वाली बात तो यह है कि जब ग्रहों की गति , स्थिति , परिभ्रमण पथ , स्वरुप और स्वभाव आकाश में ज्यो का त्यो बना हुआ है , फिर इन युगों की विशेषताओं को किन ग्रहों से जोड़ा जाए । युग-परिवर्तन निश्चित तौर पर पृथ्वी के परिवेश के परिवर्तन का परिणाम है। पृथ्वी पर जनसंख्या का बोझ बढ़ता जाना , मनुष्‍य की सुख-सुविधाओं के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों का तॉता लगना , मनुष्‍य का सुविधावादी और आलसी होते चले जाना , भोगवादी संस्कृति का विकास होना , जंगल-झाड़ का साफ होते जाना , उद्योगों और मशीनों का विकास होते जाना , पर्यावरण का संकट उपस्थित होना , ये सब अन्य ग्रहों की देन नहीं। यह पृथ्वी के तल पर ही घट रही घटनाएं हैं। पृथ्वी का वायुमंडल प्रतिदिन गर्म होता जा रहा है। आकाश में ओजोन की परत कमजोर पड़ रही है , दोनो ध्रुवों के बर्फ अधिक से अधिक पिघलते जा रहे हैं , हो सकता है , पृथ्वी में किसी दिन प्रलय भी आ जाए ,इन सबमें अन्य ग्रहों का कोई प्रभाव नहीं है। ग्रहों के प्रभाव से मनुष्‍य की चिंतनधाराएं बदलती रहती हैं , किन्तु पृथ्वी के विभिन्न भागों में रहनेवाले एक ही दिन एक ही लग्न में पैदा होनेवाले दो व्यक्तियों के बीच काफी समानता के बावजूद अपने-अपने देश की सभ्यता , संस्कृति , सामाजिक , राजनीतिक और भौगोलिक परिवेश से प्रभावित होने की भिन्नता भी रहती है। संसाधनों की भिन्नता व्यवसाय की भिन्नता का कारण बनेगी । समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग , बड़े शहरों में रहनेवाले लोग , गॉवो में रहनेवाले संपन्न लोग और गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले लोग अपने देशकाल के अनुसार ही व्यवसाय का चुनाव अलग-अलग ढंग से करेंगे। एक ही प्रकार के आई क्यू रखनेवाले दो व्यक्तियों की शिक्षा-दीक्षा भिन्न-भिन्न हो सकती है , किन्तु उनकी चिंतन-शैली एक जैसी ही होगी। इस तरह पृथ्वी के प्रभाव के अंतर्गत आनेवाले भौगोलिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।



इस कारण एक ही लग्न में एक ही डिग्री में भी जन्म लेनेवाले व्यक्ति का शरीर भौगोलिक परिवेश के अनुसार गोरा या काला हो सकता है। लम्बाई में कमी-अधिकता कुछ भी हो सकती है , किन्तु स्वास्थ्य , शरीर को कमजोर या मजबूत बनानेवाली ग्रंथियॉ , शारीरिक आवश्यकताएं और शरीर से संबंधित मामलों का आत्मविश्वास एक जैसा हो सकता है। सभी के धन और परिवार विशयक चिंतन एक जैसे होंगे , सभी में पुरुषार्थ-क्षमता या शक्ति को संगठित करने की क्षमता एक जैसी होगी। सभी के लिए संपत्ति , स्थायित्व और संस्था से संबंधित एक ही प्रकार के दृष्टिकोण होंगे। सभी अपने बाल-बच्चों से एक जैसी लगाव और सुख प्राप्त कर सकेंगे। सभी की सूझ-बूझ एक जैसी होगी। सभी अपनी समस्याओं को हल करने में समान धैर्य और संघर्ष क्षमता का परिचय देंगे। सभी अपनी जीवनसाथी से एक जैसा ही सुख प्राप्त करेंगे। अपनी-अपनी गृहस्थी के प्रति उनका दृष्टिकोण एक जैसा ही होगा। सभी का जीवन दर्शन एक जैसा ही होगा , जीवन-शैली एक जैसी ही होगी। भाग्य , धर्म , मानवीय पक्ष के मामलों में उदारवादिता या कट्टरवादिता का एक जैसा रुख होगा। सभी के सामाजिक राजनीतिक मामलों की सफलता एक जैसी होगी। सभी का अभीष्‍ट लाभ एक जैसा होगा। सभी में खर्च करने की प्रवृत्ति एक जैसी ही होगी।



किन्तु शरीर का वजन , रंग या रुप एक जैसा नहीं होगा। संयुक्त परिवार की लंबाई , चौड़ाई एक जैसी नहीं होगी। धन की मात्रा एक जैसी नहीं हो सकती है। संगठन शक्ति , शारीरिक ताकत या भाई-बहनों की संख्या में भी विभिन्नता हो सकती है। संपत्ति भी परिवेश के अनुसार ही भिन्न-भिन्न होगी । संतान की संख्या एक जैसी नहीं हो सकती है। दाम्पत्य जीवन भिन्न-भिन्न प्रकार का हो सकता है। जीवन की लंबाई में भी एकरुपता की बात नहीं होगी , कोई दीर्घजीवी तो कोई मध्यजीवी तथा कोई अल्पायु भी हो सकता है। व्यवसाय की ऊंचाई या स्तर भी अलग-अलग हो सकता है। इसी प्रकार लाभ और खर्च का स्तर भी सामाजिक , राजनीतिक , भौगोलिक , आर्थिक या अन्य संसाधनों पर निर्भर हो सकता है। किन्तु गत्यात्मक दशा पद्धति के अनुसार ही वे सभी जातक एक साथ किसी खास वर्ष में , किसी खास महीनें में , किसी खास दिन में तथा किसी खास घंटे में सुख या दुख की अनुभूति अवश्य करेंगे , उनमें सकारात्मक या नकारात्मक दृष्टिकोण उसी तरह दिखाई पड़ेगा।



किसी व्यक्ति को ईंट बनाते हुए आपने अवश्य देखा होगा। उसके पास उसका अपना सॉचा होता है तथा सनी हुई गीली मिट्टी होती है। प्रत्येक बार वह गीली मिट्टी से सॉचे को भरता है और एक-एक ईंट निकालता है। घंटे भर में वह हजार की संख्या में ईंटे निकाल लेता है। ईंट बनानेवाले की निगाह में सभी ईंटे एक तरह की ही होती हैं , किन्तु जिसे ईंटे खरीदना होता है , वह कुछ ईंटों को कमजोर कह अस्वीकृत कर देता है , जबकि उन ईंटों में जबर्दस्त समानता होती है। इस तरह एक आम के वृक्ष में आम के ढेरो फल एक साथ लगते हैं ,फलों के परिपक्व होने पर सभी फलों की बनावट और स्वाद में बड़ी समानता होती है , कोई भी उन्हें देखकर कह सकता है कि आम एक ही जाति के हैं , परंतु कुछ को आकार प्रकार और स्वाद की दृष्टि से कमजोर बताकर अस्वीकृत कर दिया जाता है। इसी प्रकार मानवनिर्मित हो या प्रकृतिसृजित , हर संसाधन के एक होने और बीज की समानता होने के बावजूद अपवाद के रुप में कुछ विषमताएं कभी आश्चर्यचकित कर देनेवाली होती हैं। इसी प्रकार एक ही दिन एक लग्न में या लग्न के एक ही अंश में जन्म लेनेवाले बहुत सारे लोगों में कुछ विषमताओं के बावजूद उनकी अधिकांश समानताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शुक्रवार, ३ अप्रैल २००९

क्या है गत्यात्मक ज्योतिष ?


प्राचीन ज्योतिष के ग्रंथों में वर्णित ग्रहों की अवस्था के अनुसार मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले ग्रहों की गति के सापेक्ष उनकी शक्ति के प्रभाव के 12-12 वर्षों का विभाजन `गत्यात्मक दशा पद्धति´ कहलाता है। यह सिद्धांत, परंपरागत ज्योतिष पर आधारित होते हुए भी पूर्णतया नवीन दृष्टिकोण पर आधारित है।



इस पद्धति में वर्षों से चली आ रही `विंशोत्तरी दशा पद्धति´ को स्थान न दे कर नये प्रमेयों तथा सूत्रों को स्थान दिया गया है। इसमें प्रत्येक ग्रह के प्रभाव को अलग-अलग 12 वर्षों के लिए निर्धारित किया गया है। साथ ही ग्रहों की शक्ति निर्धारण के लिए स्थान बल, दिक् बल, काल बल, नैसर्गिक बल, दृक बल, अष्टक वर्ग बल से भिन्न ग्रहों की गतिज और स्थैतिज ऊर्जा को स्थान दिया गया हैं। भचक्र के 30 प्रतिशत तक के विभाजन को यथेष्ट समझा गया है तथा उससे अधिक विभाजन की आवश्यकता नहीं समझी गयी है। लग्न को सबसे महत्वपूर्ण राशि समझते हुए इसे सभी प्रकार की भविष्यवाणियों का आधार माना गया है।



चंद्रमा मन का प्रतीक ग्रह है। बचपन में सभी अपने मन के अनुसार ही कार्य करना पसंद करते हैं। इसलिए इस अवधि को चंद्रमा का दशा काल माना गया है, चाहे उनका जन्म किसी भी नक्षत्र में क्यों न हुआ हो। चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के निर्धारण के लिए इसकी सूर्य से कोणिक दूरी पर ध्यान देना आवश्यक होगा। यदि चंद्रमा की स्थिति सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 90 डिग्री, या 270 डिग्री दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत और यदि 180 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण जातक के बाल मन के मनोवैज्ञानिक विकास में बाधाएं उपस्थित होती हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अत्यिधक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास संतुलित ढंग से होता है। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अति सहज, सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास काफी अच्छा होता है। 5वें-6ठे वर्ष में चंद्रमा का प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।



बुध विद्या, बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक ग्रह है। 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र विद्याध्ययन की होती है, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो। इसलिए इस अविध को बुध का दशा काल माना गया है। बुध की गत्यात्मक शक्ति के निर्धारण के लिए इसकी सूर्य से कोणिक दूरी के साथ इसकी गति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। यदि बुध सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो और इसकी गति वक्र हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि बुध सूर्य से 26-27 डिग्री के आसपास स्थित हो तथा बुध की गति 10 प्रतिदिन की हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि बुध सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो और बुध की गति 2 डिग्री प्रतिदिन के आसपास हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। बुध की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक विद्यार्थी जीवन में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि बुध की शक्ति 0 प्रतिशत हो, तो उन संदर्भो की कमजोरियों, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक के मानसिक विकास में बाधाएं आती हैं। यदि बुध की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक का मानसिक विकास उच्च कोटि का होता है। यदि बुध की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की आरामदायक स्थिति, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक का मानसिक विकास सहज ढंग से होता है। 17वें-18वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।



मंगल शक्ति एवं साहस का प्रतीक ग्रह है। युवावस्था, यानी 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक जातक अपनी शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करते हैं। इस दृष्टि से इस अविध को मंगल का दशा काल माना गया है। मंगल की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर किया जाता है। यदि मंगल सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत, यदि 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होगी। मंगल की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी युवावस्था में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि मंगल की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका मंगल स्वामी है और जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक के उत्साह में कमी आती है। यदि मंगल की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अत्यिधक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका मंगल स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका उत्साह उच्च कोटि का होता है। यदि मंगल की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका मंगल स्वामी है और जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक की परिस्थितियां सहज होती हैं। 29वें-30वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।



शुक्र चतुराई का प्रतीक ग्रह है। 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र के प्रौढ़ अपने कार्यक्रमों को युक्तिपूर्ण ढंग से अंजाम देते हैं। इसलिए इस अवधि को शुक्र का दशा काल माना गया है। शुक्र की गत्यात्मक शक्ति के आकलन के लिए, सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के साथ-साथ, इसकी गति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। यदि शुक्र सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर हो और इसकी गति वक्र हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि शुक्र सूर्य से 45 डिग्री की दूरी के आसपास स्थित हो और इसकी गति प्रतिदिन 1 डिग्री की हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि शुक्र की सूर्य से दूरी 0 डिग्री हो और इसकी गति प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। शुक्र की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी प्रौढ़ावस्था पूर्व का समय व्यतीत करते हैं। यदि शुक्र की शक्ति 0 डिग्री हो, तो उन संदर्भों की कमजोरियों, जिनका शुक्र स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने में कठिनाई प्राप्त करते हैं। यदि शुक्र की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन संदर्भों की मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका शुक्र स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक अपनी जिम्मेदारियों का पालन काफी सहज ढंग से कर पाते हैं। 41वें-42वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।



ज्योतिष की प्राचीन पुस्तकों में मंगल को राजकुमार तथा सूर्य को राजा माना गया है। मंगल के दशा काल 24 से 36 वर्ष में पिता बनने की उम्र 24 वर्ष को जोड़ दिया जाए, तो यह 48 वर्ष से 60 वर्ष हो जाता है। इसलिए इस अविध को सूर्य का दशा काल माना गया है। एक राजा की तरह ही जनसामान्य को सूर्य के इस दशा काल में अधिकाधिक कार्य संपन्न करने होते हैं। सभी ग्रहों को ऊर्जा प्रदान करने वाले अिधकतम ऊर्जा के स्रोत सूर्य को हमेशा ही 50 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए इस समय उन भावों की स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका सूर्य स्वामी है तथा जिसमें उसी स्थिति है, के कारण उनकी बची जिम्मेदारियो का पालन उच्च कोटि का होता है।



बृहस्पति धर्म का प्रतीक ग्रह है। 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र के वृद्ध, हर प्रकार की जिम्मेदारियों निर्वाह कर, धार्मिक जीवन जीना पसंद करते हैं। इसलिए इस अविध को बृहस्पति का दशा काल माना गया है। बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर किया जाता है। यदि बृहस्पति सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत तथा यदि 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होगी। बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपने वृद्ध जीवन में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि बृहस्पति की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका बृहस्पति स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका जीवन निराशाजनक बना रहता है। यदि बृहस्पति की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका बृहस्पति स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण अवकाश प्राप्ति के बाद का जीवन उच्च कोटि का होता है। यदि बृहस्पति की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की आरामदायक स्थिति, जिनका बृहस्पति स्वामी है और जिसमें इसकी स्थिति है, के कारण जातक की परिस्थितियां वृद्धावस्था में काफी सुखद होती हैं।



प्राचीन ज्योतिष के कथनानुसार ही शनि को, अतिवृद्ध ग्रह मानते हुए, जातक के 72 वर्ष से 84 वर्ष की उम्र तक का दशा काल इसके आधिपत्य में दिया गया है। शनि की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर ही किया जाता है। यदि शनि सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि शनि सूर्य से 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि शनि सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। शनि की शक्ति के अनुसार ही जातक अति वृद्धावस्था में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि शनि की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका शनि स्वामी है, या जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण अति वृद्धावस्था का उनका समय काफी निराशाजनक होता है। यदि शनि की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अत्यिधक मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका शनि स्वामी है, या जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका यह समय उच्च कोटि का होता है। यदि शनि की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अति सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका शनि स्वामी हो, या जिसमें उसकी स्थिति हो, के कारण, वृद्धावस्था के बावजूद, उनका समय काफी सुखद होता है।



इसी प्रकार जातक का उत्तर वृद्धावस्था का 84 वर्ष से 96 वर्ष तक का समय यूरेनस, 96 से 108 वर्ष तक का समय नेप्च्यून तथा 108 से 120 वर्ष तक का समय प्लूटो के द्वारा संचालित होता है। यूरेनस, नेप्च्यून एवं प्लूटो की गत्यात्मक शक्ति का निधाZरण भी, मंगल, बृहस्पति और शनि की तरह ही, सूर्य से इसकी कोणात्मक दूरी के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार इस दशा पद्धति में सभी ग्रहों की एक खास अविध में एक निश्चित भूमिका होती है। विंशोत्तरी दशा पद्धति की तरह एक मात्र चंद्रमा का नक्षत्र ही सभी ग्रहों को संचालित नहीं करता है।



सभी ग्रह, अपनी अवस्था विशेष में कुंडली में प्राप्त बल और स्थिति के अनुसार, अपने कार्य का संपादन करते हैं। लेकिन इन 12 वर्षों में भी समय-समय पर उतार-चढ़ाव आना तथा छोटे-छोटे अंतरालों के बारे में जानकारी इस पद्धति से संभव नहीं है। 12 वर्ष के अंतर्गत होने वाले उलट-फेर का निर्णय `लग्न सापेक्ष गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ से करें, तो दशा काल से संबंधित सारी कठिनाइयां समाप्त हो जाएंगी। इन दोनों सिद्धांतों का उपयोग होने से ज्योतिष विज्ञान दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति के पथ पर होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर आधारित मेरे ब्‍लागपर आपका स्‍वागत है।

शुक्रवार, २४ अक्तूबर २००८

हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं

एक ही ग्रह का कोण बदल जाने से उसका प्रभाव बदल जाता है
पृथ्वी के सभी जड़-चेतन , जीव-जंतु और मनुष्य ग्रहों के विकिरण , कॉस्मि‍क किरण , विद्युत-चुम्बकीय तरंग , प्रकाश , गुरुत्वाकर्षण या गति से ही प्रभावित हैं । इन सभी शक्तियों की चर्चा भौतिक विज्ञान में की गयी है। पुन: विज्ञान इस बात की भी चर्चा करता है कि सभी प्रकार की शक्तियॉ एक-दूसरे के स्वरुप में रुपांतरित की जा सकती है। ऊपर लिखित शक्तियों के चाहे जिस रुप से ग्रह हमें प्रभावित करें , वह शक्ति निश्चि‍त रुप से ग्रहों के स्थैतिक और गतिज ऊर्जा से प्रभावित हैं , क्योंकि व्यावहारिक तौर पर मैंने पाया है कि ग्रह-शक्ति का संपूर्ण आधार उसकी गति में छुपा हुआ है। पुन: एक प्रश्न और उठता है , सभी ग्रह मिलकर किसी दिन पृथ्वीवासियों के लिए ऊर्जा या शक्ति से संबंधित एक जैसा वातावरण बनाते हैं , तो उसका प्रभाव भिन्न-भिन्न वनस्पति , जीव-जंतु , और मनुष्यों पर भिन्न-भिन्न रुप से क्यों पड़ता है ? एक ही तरह की किरणों का प्रभाव एक ही समय पृथ्वी के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न तरह से क्यों पड़ता है ? इस बात को समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना पड़ेगा। मई का महीना चल रहा हो , मध्य आकाश में सूर्य हो ,दोपहर का समय हो , प्रचण्ड गर्मी पड़ती है। इसी समय पृथ्वी के जिस भाग में सुबह हो रही होगी , वहॉ सुबह के वातावरण के अनुरुप , जहॉ शाम हो रही होगी , वहॉ शाम के अनुरुप तथा जहॉ मध्य रात्रि होगी , वहॉ समस्त वातावरण आधी रात का होगा। अभिप्राय यह है कि एक ही किरण का कोण बदल जाने से उसका प्रभाव बिल्कुल बदल जाता है। दोपहर की सूर्य की प्रचंड गर्मी , जो अभी व्याकुल कर देनेवाली है , आधीरात को स्वयंमेव राहत देनेवाली हो जाती है। प्रत्येक दो घंटे में पृथ्वी अपने अक्ष में 30 डिग्री आगे बढ़ जाती है और इसके निरंतर गतिशील होने से सभी ग्रहों के प्रभाव का कार्यक्षेत्र बदल जाता है। पृथ्वी के हर क्षण के बदलाव के कारण ग्रहों के कोण में बदलाव आता है , जिसके फलस्वरुप हर क्षण सृजन , जन्म-मरण , आविर्भाव आदि जीवात्मा की ग्रंथियों में दर्ज हो जाती है। साथ ही सदैव बदलते ग्रहीय परिवेश के साथ हर जीवात्मा की धनात्मक-ऋणात्मक प्रतिक्रिया होती है। इस तरह एक ही ग्रहीय वातावरण का पृथ्वी के चप्पे-चप्पे में स्थित जड़-चेतन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है।



ग्रह की गति , प्रकाश , गुरूत्‍वाकर्षण से लोग प्रभावित होते हैं
प्रश्न यह भी है कि जब ग्रह की गति , प्रकाश ,गुरुत्वाकर्षण या विद्युत-चुम्बकीय-शक्ति से लोग प्रभावित हैं , तो अभी तक ग्रह-शक्ति की तीव्रता की जानकारी के लिए भौतिक विज्ञान का सहारा नहीं लेकर फलित ज्योतिष में स्थानबल , दिक्बल , कालबल , नैसर्गिक बल , चेष्टाबल , दृ‍ष्टि‍बल , आत्मकारक , योगकारक , उत्तरायण , दक्षिणायण , अंशबल , पक्षबल आदि की चर्चा में ही ज्योतिषी क्यों अपना अधिकांश समय गंवाते रहें ? आज इनसे संबंधित हर नियमों और को बारी बारी से हर कुंडलियों में जॉच की जाए , इन नियमों को कम्प्यूटरीकृत कर इसकी जॉच की जाए , मेरा दावा है , कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा। भौतिक विज्ञान में जितनें प्रकार की शक्तियों की चर्चा की गयी है , सभी को मापने के लिए इकाई , सूत्र या संयंत्र की व्यवस्था है । ग्रहों की शक्ति को मापने के लिए हमारे पास न तो सूत्र है, न इकाई और न ही संयंत्र।



विकासशील विज्ञानो का एकदूसरे से परस्‍पर सहसंबंध आवश्‍यक

आज से हजारो वर्ष पूर्व सूर्यसिद्धांत नामक पुस्तक में ग्रहों की विभिन्न गतियों का उल्लेख है , इन गतियों के भिन्न-भिन्न नामकरण हैं किन्तु इन गतियों की उपयोगिता केवल ग्रह की आकाश में सम्यक् स्थिति को दिखाने तक ही सीमित थी। इन्हीं गतियों में विभिन्न प्रकार से ग्रह की शक्तियॉ छिपी हुई हैं , इस बात पर अभी तक लोगों का ध्यान गया ही नहीं था। किसी भी स्थान पर ये ग्रह विभिन्न गतियों से संयुक्त हो सकते हैं। अत: एक ही स्थान पर रहकर ये ग्रह भिन्न गति के कारण भिन्न फल को प्रस्तुत करते हैं , जातक को भिन्न मनोदशा देते हैं। फलित ज्योतिष में ग्रह-गतियों के विभिन्न फलों का पूरा उपयोग किया जा सकता है , जिसका उल्लेख ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में नहीं किया गया है। इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि उस समय भौतिक विज्ञान में उल्लि‍खित स्थैतिज या गतिज ऊर्जा , गुरुतवाकर्षण , कॉस्मि‍क किरण , विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र आदि की खोज नहीं हुई हो। स्मरण रहे , हर विज्ञान का विकास द्रुतगति से तभी हो सकता है , जब विकासशील विज्ञान एक दूसरे से परस्पर धनात्मक सहसंबंध बनाए रखें। उन दिनों भौतिक विज्ञान का बहुआयामी विकास नहीं हो पाया था , इसलिए हमारे ऋषि या पूर्वज ग्रहों की शक्ति की खोज आकाश के विभिन्न स्थानों में उसकी स्थिति में ढूंढ़ रहे थे। उन्होने ग्रहों की शक्ति को खोज में एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया था। कभी वे पातें कि ग्रहों की शक्ति भिन्न-भिन्न राशि‍यों में भिन्न-भिन्न है। कभी महसूस करते कि एक ही राशि‍ में ग्रह भिन्न-भिन्न फल दे रहें हैं। उसी राशि‍ में रहकर कभी अपनी सबसे बड़ी विशेषता तो कभी अपनी कमजोरी दर्ज कराते हैं। आज के सभी विद्वान ज्योतिषी भी अवश्य ही ऐसा महसूस करते होंगे। मैं अनेक कुंडलियों में एक ही राशि‍ में स्थित ग्रहों से उत्पन्न दो विपरीत प्रभावों को देख चुका हूं। कर्क लग्न हो , पंचम भाव में वृश्चि‍क राशि‍ का बृहस्पति हो , ऐसी स्थिति में व्यक्ति संतान सुख से परिपूर्ण , संतृप्त भी हो सकता है , तो निस्संतान और दुखी भी। वृश्चि‍क राशि‍ के पंचम भाव का बृहस्पति चाहे जिस द्रेष्काण , नवमांश , षड्वर्ग या अष्टकवर्ग में हो , जितने भी अच्छे अंक प्राप्त कर लें , यदि वह मंगल के सापेक्ष अधिक गतिशील नहीं हुआ , तो जातक धनात्मक परिणाम कदापि नहीं प्राप्त कर सकता। अत: ग्रह की शक्ति किसी विशेष स्थान में नहीं , वरन् उसके राशि‍श की तुलना में बढ़ी हुई गति के कारण होती है। ग्रह के बलाबल निर्धारण के लिए परंपरा से दिक्बल को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। राजयोग प्रकरण की समीक्षा में उद्धृत कुंडली में मंगल दिक्बली था , किन्तु जातक युवावस्था में ही टी बी का मरीज था। मैंने पाया कि उसके जन्मकाल में मंगल समरुपगामी था , जो अतिशीघ्री राशि‍श के भाव में स्थित था। इस कारण मंगल ऋणात्मक था और युवावस्था में ही यानि मंगल के काल में ही जातक की सारी परिस्थितियॉ और प्रवृत्तियॉ ऋणात्मक थी। फलित ज्योतिष में अब तक ग्रहों की स्थिति को ही सर्वाधिक महत्व दिया गया है , उसकी हैसियत या शक्ति को समझने की चेष्टा हीं की गयी है। धनभाव में स्थित वृष का बृहस्पति करोड़पति और भिखारी दोनों को जन्म दे सकता है। इस कारण बृहस्पति और शुक्र दोनों में अंतिर्नहित शक्ति को भिन्न तरीके से समझने की बात होनी चाहिए। थाने में बैठे सभी लोगों को थानेदार समझ लिया जाए तो अनर्थ ही हो जाएगा , क्योंकि भले ही वहॉ अधिक समय थानेदार की उपस्थिति रहती हो , परंतु कभी वहॉ एस पी , डी एस पी और कभी सफेदपोश अपराधी भी बैठे हो सकते हैं।





अभी तक ग्रहों के बलाबल को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों की ओर से जितने तरह के सुझाव ज्योतिष के ग्रंथों में दिए गए हैं , वे पर्याप्त नहीं हैं। परंपरागत सभी नियमों की जानकारी , जो शक्ति निर्धारण के लिए बनायी गयी है , में सर्वश्रेष्ठ कौन सा है , निकालना मुश्कि‍ल है , जिसपर भरोसा कर तथा जिसका प्रयोग कर भविष्यवाणी को सटीक बनाकर जनसामान्य के सामने पेश किया जा सके। ऐसी अनेक कुंडलियॉ मेरी निगाहों से होकर भी गुजरी हैं , जहॉ ग्रह को शक्तिशाली सिद्ध करने के लिए प्राय: सभी नियम काम कर रहे हैं , फिर भी ग्रह का फल कमजोर है। इसका कारण यह है कि उपरोक्त सभी नियमों में से एक भी ग्रह-शक्ति के मूलस्रोत से संबंधित नहीं हैं। इसी कारण फलित ज्योतिष अनिश्चि‍त वातावरण के दौर से गुजर रहा है।

गुरुवार, २ अक्तूबर २००८

फलित ज्योतिष : विज्ञान या अंधविश्वास

फलित ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास , इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है। परंपरावादी और अंधविश्वासी विचारधारा के लोग ,जो कई स्थानों पर ज्योतिष पर विश्वास करने के कारण धोखा खा चुकें हैं ,भी इस शास्त्र पर संदेह नहीं करते। सारा दोषारोपण ज्योतिषी पर ही होता है। वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं। ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मै सरकार ,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानती हूं। इन्होने आजतक ज्योतिष को न तो अंधविश्वास ही सिद्ध किया और न ही विज्ञान ? सरकार यदि ज्योतिष को अंधविश्वास समझती तो जन्मकुंडली बनवाने या जन्मपत्री मिलवाने के काम में लगे ज्योतिषियों पर कानूनी अड़चनें आ सकती थी। यज्ञ हवन करवाने या तंत्र-मंत्र का प्रयोग करनेवाले ज्योतिषियों के कार्य में बाधाएं आ सकती थी। सभी पत्रिकाओं में राशि-फल के प्रकाशन पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ , मद्यपान , बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। आखिर क्यों ? क्या सरकार ज्योतिष को विज्ञान समझती है ? नहीं, अगर वह इस विज्ञान समझती तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, सेमिनार आदि का आयोजन होता तथा विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। परंतु आजतक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए तो लगभग सभी पत्रिकाएं यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, इंटरव्यू , भविष्यवाणियॉ आदि निकालती रहती है पर जब आजतक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका, जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया तो फिर ऐसे लेखों या समाचारों का क्या औचित्य ? पत्रिकाओं के विभिन्न लेखों हेतु किया जानेवाला ज्योतिषियों कें चयन का तरीका ही गलत है । उनकी व्यावसायिक सफलता को उनके ज्ञान का मापदंड समझा जाता है , लेकिन वास्तव में किसी की व्यावसायिक सफलता उसकी व्यावसायिक योग्यता का परिणाम होती है ,न कि विषय-विशेष की गहरी जानकारी। इन सफल ज्योतिषियों का ध्यान फलित ज्योतिष के विकास में न होकर अपने व्यावसायिक विकास पर होता है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा ज्योतिष विज्ञान का प्रतिनिधित्व करवाना पाठकों को कोई संदेश नहीं दें पाता है। जो ज्योतिषी ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध कर सकें , उन्हें ही अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए या एक प्रतियोगिता में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान देकर सभी ज्योतिषियों से उस जन्मपत्री का विश्लेषण करवाना चाहिए । उसकी पूरी जिंदगी कें बारे में जो ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी कर सके उसे ही अखबारों ,पत्रिकाओं में स्थान मिलना चाहिए। परंतु ज्योतिषियों की परीक्षा लेने के लिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया ,फलस्वरुप ज्योतिष की गहरी जानकारी रखनेवाले समाज के सम्मुख कभी नहीं आ सके और समाज नीम-हकीम ज्योतिषियों से परेशान होता रहा। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ लोग और कुछ संस्थाएं ऐसी है , जो ज्योतिष विज्ञान के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे ज्योतिष से संबंधित बातों को सुनने में रुचि कम और उपहास में रुचि ज्यादा रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में समन्वयवादिता की कमी भी आजतक ज्योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध कर पायी है।



ज्योतिष विज्ञान की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए यह कहा जाता है कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, किन्तु ज्योतिष शास्त्र यह मानता है कि पृथ्वी स्थिर है और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। जब यह परिकल्पना ही गलत है तो उसपर आधारित भविष्यवाणी कैसे सही हो सकती है ? पर बात ऐसी नहीं है । जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं , वह चलायमान होते हुए भी हमारे लिए स्थिर है , ठीक उसी प्रकार , जिस प्रकार हम किसी गाड़ी में चल रहे होते हैं , वह हमारे लिए स्थिर होती है और किसी स्टेशन पर पहुंचते ही हम कहते हैं , `अमुक शहर आ गया।´ जिस पृथ्वी में हम रहतें हैं , उसमें हम स्थिर सूर्य के ही उदय और अस्त का प्रभाव देखते हैं। इसी प्रकार अन्य आकाशीय पिंडों का भी प्रभाव हमपर पड़ता है। पृथ्वी से कोई कृत्रिम उपग्रह को किसी दूसरे ग्रह पर भेजना होता है तो पृथ्वी को स्थिर मानकर ही उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की दूरी निकालनी पड़ती है। जब यह सब गलत नहीं होता तो ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानते हुए उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की गति पर आधारित फल कैसे गलत हो सकता है ?



ज्योतिष की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सौरमंडल में सूर्य तारा है , पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं । इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी महत्वहीन है। इसके उत्तर में मेरा यह कहना है कि सभी विज्ञान में एक ही शब्दों के तकनीकी अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में व्यक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। किन्तु फलित ज्योतिष पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंडल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है । सूर्य, चंद्र , बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी , उसके जड़-चेतन और मानव-जाति पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को ग्रह कहा जाता है। ग्रहों की इस शास्त्र में यही परिभाषा दी गयी है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।



तीसरा तर्क यह है कि ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रह माना गया है , जबकि ये ग्रह नहीं हैं । ये तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले यह जानकारी आवश्यक है कि राहू और केतु हैं क्या ? पृथ्वी को स्थिर मानने से पृथ्वी के चारो ओर सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण-पथ बन जाता है। पृथ्वी के चारो ओर चंद्रमा का एक परिभ्रमण पथ है ही । ये दोनो परिभ्रमण-पथ एक दूसरे को दो विन्दुओं पर काटते हैं । अतिप्राचीनकाल में ज्योतिषियों को मालूम नहीं था कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंडों पर पड़ने से ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं। जब ज्योतिषियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते देखा, तो वे इसके कारण ढूंढ़ने लगे। दोनो ही समय इन्होने पाया कि सूर्य, चंद्र, पृथ्वी एवं सूर्य, चंद्र के परिभ्रमण-पथ पर कटनेवाले दोनो विन्दु लम्बवत् हैं। बस उन्होने समझ लिया कि इन्हीं विन्दुओं के फलस्वरुप खास अमावस्या को सूर्य तथा पूर्णिमा की रात्रि को चंद्र आकाश से लुप्त हो जाता है। उन्होने इन विन्दुओं को महत्वपूर्ण पाकर इन विन्दुओं का नामकरण `राहू´ और `केतु´ कर दिया। इस स्थान पर उन्होने जो गल्ती की, उसका खामियाजा ज्योतिष विज्ञान अभी तक भुगत रहा है ,क्योंकि राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड हैं ही नहीं और हमलोग ग्रहों की जिस उर्जा से भी प्रभावित हो---गुरुत्वाकर्षण, गति, किरण या विद्युत-चुम्बकीय शक्ति, राहू और केतु इनमें से किसी का भी उत्सर्जन नहीं कर पाते। इसलिए इनसे प्रभावित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यही कारण है कि राहू और केतु पर आधारित भविष्यवाणी सही नहीं हो पाती।



चौथा तर्क यह है कि सभी ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में विविधता क्यों होती है ? हम सभी जानते हैं कि कोई भी शास्त्र या विज्ञान क्यों न हो कार्य और कारण में सही संबंध स्थापित किया गया हो तो निष्कर्ष निकालने में कोई गल्ती नहीं होती। इसके विपरित यदि कार्य और कारण में संबंध भ्रामक हो तो निष्कर्ष भी भ्रमित करनेवाले होंगे। ज्योतिष विज्ञान का विकास बहुत ही प्राचीन काल में हुआ। उस काल में कोई भी शास्त्र काफी विकसित अवस्था में नहीं था।सभी शास्त्रों और विज्ञानों में नए-नए प्रयोग कर युग के साथ-साथ उनका विकास करने पर बल दिया गया , पर अफसोस की बात है कि ज्योतिष विज्ञान अभी भी वहीं है जहॉ से इसने यात्रा शुरु की थी । महर्षि जैमिनी और पराशर के द्वारा ग्रह शक्ति मापने और दशाकाल निर्धारण के जो सूत्र थे ,उसकी प्रायोगिक जॉच कर उन्हें सुधारने की दिशा में कभी कार्य नहीं किया गया। अंधविश्वास समझते हुए ज्योतिष-शास्त्र की गरिमा को जैसे-जैसे धक्का पहुंचता गया, इस विद्या का हर युग में ह्रास होता ही गया। फलस्वरुप यह 21वीं सदी में भी घिसट-घिसटकर ही चल रहा है। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में अंतर का कारण कार्य और कारण में पारस्परिक संबंध की कमी होना है। ग्रह-शक्ति निकालने के लिए मानक-सूत्र का अभाव है। कुल 10-12 सूत्र हैं ,सभी ज्योतिषी अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं। दशाकाल निर्धारण का एक प्रामाणिक सूत्र है , पर उसमें एक साथ जातक के चार-चार दशा चलते रहतें हैं-एक महादशा, दूसरी अंतर्दशा, तीसरी प्रत्यंतर दशा और चौथी सूक्ष्म महादशा। इतने नियमों को यदि कम्प्यूटर में भी डाल दिया जाए , तो वह भी सही परिणाम नहीं दे पाता है , तो पंडितों की भविष्यवाणी में अंतर होना तो स्वाभाविक है। सभी ज्योतिषी अलग अलग दशा को महत्वपूर्ण मान लें तो सबके कथन में अंतर तो आएगा ही ।



अगला तर्क यह है कि आजकल सभी पत्रिकाओं में लग्नफल की चर्चा रहती है। एक राशि में जन्म लेनेवाले लाखों लोगों का भाग्य एक जैसा कैसे हो सकता है ? यह वास्तव में आश्चर्य की बात है , किन्तु यह सच है कि किसी ग्रह का प्रभाव एक राशि वालो पर तो नहीं , पर एक लग्न के लाखों करोड़ों लोगों पर एक जैसा ही पड़ता है। `एक जैसा फल´ से एक स्वभाव वाले फल का बोध होगा ,न कि मात्रा में समानता का । मात्रा का स्तर तो उसकी जन्मकुंडली एवं अन्य स्तर पर निर्भर करता है ,जैसे किसी खास समय किसी लग्न के लिए धन का लाभ एक मजदूर के लिए 50-100 रु का तथा एक बड़े व्यवसायी के लिए लाखों-करोड़ों का हो सकता है। लेकिन अधिकांश लोगों को अपने लग्न की जानकारी नहीं होती , वे पत्रिकाओं में निकलनेवाले राशिफल को देखकर भ्रमित होते रहते हैं।



अगला तर्क यह है कि किसी दुर्घटना में एक साथ सैकड़ों हजारो लोग मारे जाते हैं ,क्या सभी की कुंडली में ज्योतिषीय योग एक-सा होता है ? इस तर्क का यह उत्तर दिया जा सकता है कि ज्योतिष में अभी काफी कुछ शोध होना बाकी है , जिसके कारण किसी की मृत्यु की तिथि बतला पाना अभी संभव नहीं है ,पर दुर्घटनाग्रस्त होनेवालों के आश्रितों की जन्मकुंडली में कुछ कमजोरियॉ --संतान ,माता ,पिता ,भाई ,पति या पत्नी से संबंधित कष्ट अवश्य देखा गया है । किसी दुर्घटना में एक साथ इतने लोगों की मृत्यु प्रकृति की ही व्यवस्था हो सकती है वरना ड्राइवर या रेलवे कर्मचारी की गल्ती का खामियाजा उतने लोगों को क्यों भुगतना पड़ता है ,उन्हें मौत की सजा क्यों मिलती है, जो बड़े-बड़े अपराधियों को बड़े-बड़े दुष्कर्म करने के बावजूद नहीं दी जाती।



इसी तरह गणित की सुविधा के लिए किए गए आकाश के 12 काल्पनिक भागों के आधार पर भी ज्योतिष को गलत साबित करने की दलील दी जाती है। यदि इसे सही माना जाए तो आक्षांस और देशांतर रेखाओं पर आधारित भूगोल को भी गलत माना जा सकता है। आकाश के इन काल्पनिक 12 भागों की पहचान के लिए इनकें विस्तार में स्थित तारासमूहों के आधार पर किया जानेवाला नामकरण पर किया जानेवाला विवाद का भी कोई औचित्य नहीं हैं , क्योंकि आकाश के 360 डिग्री को 12 भागों में बॉट देने से अनंत तक की दूरी एक ही राशि में आ जाती है।



पूजा-पाठ या ग्रह की शांति से भाग्य को बदल दिए जाने की बात भी वैज्ञानिको के गले नहीं उतरती है। हमारे विचार से भी ऐसा कर पाना संभव नहीं है। किसी बालक के जन्म के समय की सभी ग्रहों सहित आकाशीय स्थिति के अनुसार जो जन्मकुंडली बनती है, उसके अनुसार उसके पूरे जीवन की रुपरेखा निश्चित हो जाती है , ऐसा हमने अपने अनुभव में पाया है। पूजा पाठ या ग्रह-शांति से भाग्य में बदलाव लाया जा सकता , तो इसका सर्वाधिक लाभ पंडित वर्ग के लोग ही उठाते और समाज के अन्य वर्गों की तरक्की में रुकावटें आती। लेकिन यह सत्य है कि पूजा-पाठ, यज्ञ-जाप, मंगला-मंगली, मुहूर्त्‍त आदि अवांछित तथ्यों एवं हस्‍तरेखा , हस्‍ताक्षर विज्ञान , तंत्र- , जादू-टोना, भूत-प्रेत, झाडफूंक , न्‍यूमरोलोजी , फेंगसुई, वास्तु, टैरो कार्ड, लाल किताब आदि ज्‍योतिष से इतर विधाओं के भी ज्‍योतिष में प्रवेश से ही ज्योतिष विज्ञान की तरक्की में बाधा पहुंची है। ज्योतिष विज्ञान मूलत: संकेतों का विज्ञान है , यह बात न तो ज्योतिषियों को और न ही जनता को भूलनी चाहिए। किन्तु जनता ज्योतिषी को भगवान बनाकर तथा ज्योतिषी अपने भक्तों को बरगलाकर फलित ज्योतिष के विकास में बाधा पहुंचाते आ रहे हैं। हर विज्ञान में सफलता और असफलता साथ-साथ चलती है। मेडिकल साइंस को ही लें। हर समय एक-न-एक रोग डॉक्टर को रिसर्च करने को मजबूर करते हैं। किसी परिकल्पना को लेकर ही कार्य-कारण में संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, पर सफलता पहले प्रयास में ही मिल जाती है, ऐसी बात नहीं है। अनेकानेक प्रयोग होते हैं , करोड़ों-अरबों खर्च किए जाते हैं, तब ही सफलता मिल पाती है । भूगर्भ-विज्ञान को ही लें, प्रारंभ में कुछ परिकल्पनाओं को लेकर ही कि यहॉ अमुक द्रब्य की खान हो सकती है , कार्य करवाया जाता था ,परंतु बहुत स्थानों पर असफलता हाथ आती थी। धीरे-धीरे इस विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि कसी भी जमीन के भूगर्भ का अध्ययन कम खर्च से ही सटीक किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजने के लिए अरबों रुपए खर्च कर तैयार किए गए उपग्रह के नष्ट होने पर वैज्ञनिकों ने हार नहीं मानी। उनकी कमजोरियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारने का प्रयास किया गया तो अब सफलता मिल रही है। उपग्रह से प्राप्त चित्र के सापेक्ष की जानवाली मौसम की भविष्यवाणी नित्य-प्रतिदिन सुधार के क्रम में देखी जा रही है। मानव जब-जब गल्ती करते हैं , नई-नई बातों को सीखते हैं ,तभी उनका पूरा विकास हो पाता है , परंतु ज्योतिष-शास्त्र के साथ तो बात ही उल्टी है , अधिकांश लोग तो इसे विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं , सिर्फ खामियॉ ही गिनाते हैं और जो मानते हैं , वे अंधभक्त बने हुए हैं । यदि कोई ज्योतिषी सही भविष्यवाणी करे तो उसे प्रोत्साहन मिले न मिले ,उसके द्वारा की गयी एक भी गलत भविष्यवाणी का उसे व्यंग्यवाण सुनना पड़ता है। इसलिए अभी तक ज्योतिषी इस राह पर चलते आ रहें हैं , जहॉ चित्त भी उनकी और पट भी उनकी ही हो। यदि उसने किसी से कह दिया, `तुम्हे तो अमुक कष्ट होनेवाला है , पूजा करवा लो ,यदि उसने पूजा नहीं करवाई और कष्ट हो गया,तो ज्योतिषी की बात बिल्कुल सही। यदि पूजा करवा ली और कष्ट हो गया तो `पूजा नहीं करवाता तो पता नहीं क्या होता´ । यदि पूजा करवा ली और कष्ट नहीं हुआ तो `ज्योतिषीजी तो किल्कुल कष्ट को हरनेवाले हैं´ जैसे विचार मन में आते हैं। हर स्थिति में लाभ भले ही पंडित को हो , फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी धक्का पहुंचता आ रहा है।



किन्तु लाख व्यवधानों के बावजूद भी प्रकृति के हर चीज का विकास लगभग नियिचत होता है प्रकृति का यह नियम है कि जिस बीज को उसने पैदा किया , उसे उसकी आवश्यकता की वस्तु मिल ही जाएगी । देख-रेख नहीं होने के बावजूद प्रकृति की सारी वस्तुएं प्रकृति में विद्यमान रहती ही है। बालक जन्म लेने के बाद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी मॉ पर निर्भर होता है। यदि मॉ न हों , तो पिता या परिवार के अन्य सदस्य उसका भरण-पोषण करते हैं। यदि कोई न हो , तो बालक कम उम्र में ही अपनी जवाबदेही उठाना सीख जाता है। एक पौधा भी अपने को बचाने के लिए कभी टेढ़ा हो जाता है , तो कभी झुक जाता है। लताएं मजबूत पेड़ों से लिपट कर अपनी रक्षा करती हैं । कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सबकी रक्षा किसी न किसी तरह हो ही जाती है और ऐसा ही ज्योतिष शास्त्र के साथ हुआ। आज जब सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं ज्योतिष विज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपना रही है, सभी परंपरागत ज्योतिषी राहू , केतु और विंशोत्तरी के भ्रामक जाल में फंसकर अपने दिमाग का कोई सदुपयोग न कर पाने से तनावग्रस्त हैं , वहीं दूसरी ओर ज्योतिष विज्ञान का इस नए वैज्ञानिक युग के अनुरुप गत्यात्मक विकास हो चुका है। `गत्यात्मक ज्योतिषीय अनुसंधान केन्द्र´ द्वारा ग्रहों के गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति को निकालने के सूत्र की खोज के बाद आज ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन चुका है ।


जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए दो वैज्ञानिक पद्धतियों `गत्यात्मक दशा पद्धति´ और `गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ का विकास किया गया है , जिसके द्वारा जातक अपने पूरे जीवन के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र प्राप्त कर सकते हैं। इस दशा-पद्धति के अनुसार शरीर में स्थित सभी ग्रंथियों की तरह सभी ग्रह एक विशेष समय ही मानव को प्रभावित करते हैं। जन्म से 12 वर्ष तक की अवधि में मानव को प्रभावित करनेवाला मन का प्रतीक ग्रह चंद्रमा है , इसलिए ही बच्चे सिर्फ मन के अनुसार कार्य करतें हैं ,इसलिए अभिभावक भी खेल-खेल में ही उन्हें सारी बातें सिखलाते हैं। 12 वर्ष से 24 वर्ष तक के किशोरों को प्रभावित करनेवाला विद्या , बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक ग्रह बुध होता है, इसलिए इस उम्र में बच्चों में सीखने की उत्सुकता और क्षमता काफी होती है। 24 वर्ष से 36 वर्ष तक के युवकों को प्रभावित करनेवाला शक्ति-साहस का प्रतीक ग्रह मंगल होता है, इसलिए इस उम्र में युवक अपने शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करते हैं । 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक के प्रौढ़ों को प्रभावित करनेवाला युक्तियो का ग्रह शुक्र है , इसलिए इस उम्र में अपनी युक्ति-कला का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है । 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र के व्यक्ति को प्रभावित करनेवाला ग्रह समस्त सौरमंडल की उर्जा का स्रोत सूर्य है, इसलिए इस उम्र के लोगों पर अधिकाधिक जिम्मेदारियॉ होती हैं, बड़े-बड़े कार्यों के लिए उन्हें अपने तेज और धैर्य की परीक्षा देनी पड़ती है। 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र को प्रभावित करनेवाला धर्म, न्याय का प्रतीक ग्रह बृहस्पति है, इसलिए यह समय सभी प्रकार के जवाबदेहियों से मुक्त होकर धार्मिक जीवन जीने का माना गया है। 72 वर्ष से 84 वर्ष तक की अतिवृद्धावस्था को प्रभावित करनेवाला सौरमंडल का दूरस्थ ग्रह शनि है। इसी प्रकार 84 से 96 तक यूरेनस , 96 से 108 तक नेपच्यून और 108 से 120 वषZ की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव माना गया है।
इस दशा-पद्धति के अनुसार यदि पूर्णिमा के समय बच्चे का जन्म हो तो बचपन में स्वास्थ्य की मजबूती और प्यार-दुलार का वातावरण मिलने के कारण उनका मनोवैज्ञानिक विकास काफी अच्छा होता हैं। इसके विपरित, अमावस्या के समय जन्म लेनेवाले बच्चे में स्वास्थ्य या वातावरण की गड़बड़ी से मनोवैज्ञानिक विकास बाधित होते देखा गया है। बच्चे के जन्म के समय बुध ग्रह की स्थिति मजबूत हो तो विद्यार्थी जीवन में उन्हें बौद्धिक विकास के अच्छे अवसर मिलते हैं । विपरित स्थिति में बौद्धिक विकास में कठिनाई आती हैं। जन्म के समय मंगल मजबूत हो तो 24वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक मनोनुकूल माहौल प्रााप्त होता है। विपरीत स्थिति में जातक अपने को शक्तिहीन समझता है। जन्म के समय मजबूत शुक्र की स्थिति 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक सारी जवाबदेहियों को सुचारुपूर्ण ढंग से अंजाम देती हैं, विपरीत स्थिति में , काम सुचारुपूर्ण ढंग से नहीं चल पाता है। इसी प्रकार मजबूत सूर्य 48 वर्ष से 60 वर्ष तक व्यक्ति के स्तर में काफी वृद्धि लाते हैं, किन्तु कमजोर सूर्य बड़ी असफलता प्रदान करते हैं। जन्मकाल का मजबूत बृहस्पति से व्यक्ति का अवकाश-प्राप्त के बाद का जीवन सुखद होता हैं।विपरीत स्थिति में अवकाश प्राप्‍त करने के बाद उनकी जवबदहेही खत्म नहीं हो पाती हैं। मजबूत शनि के कारण 72 वर्ष से 84 वर्ष तक के अतिवृद्ध की भी हिम्मत बनी हुई होती है, जबकि कमजोर शनि इस अवधि को बहुत कष्टप्रद बना देते हैं।इन ग्रहों का सर्वाधिक बुरा प्रभाव क्रमश: 6ठे, 18वें, 30वें, 42वें ,54वें, 66वें और 78वें वर्ष में देखा जा सकता है।



गत्यात्मक ज्योतिष की खोज के पश्चात् किसी व्यक्ति का भविष्य जानना असंभव तो नहीं , मुश्किल भी नहीं रह गया है , क्योंकि व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करने में बड़ा अंश विज्ञान के नियम का होता है , छोटा अंश ही सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या पारिवारिक होता है या व्यक्ति खुद तय करता है। वास्तव में , हर कर्मयोगी आज यह मानते हैं कि कुछ कारकों पर आदमी का वश होता है , कुछ पर होकर भी नहीं होता और कुछ कुछ पर तो होता ही नहीं । व्यक्ति का एक छोटा निर्णय भी गहरे अंधे कुएं में गिरने या उंची छलांग लगाने के लिए काफी होता है। इतनी अनिश्चितता के मध्य भी अगर ज्योतिष भविष्य में झांकने की हिम्मत करता आया है तो वह उसका दुस्साहस नहीं , वरण् समय-समय पर किए गए रिसर्च के मजबूत आधार पर उसका खड़ा होना है।

मंगलवार, ३० सितम्बर २००८

वार से फलित कथन अवैज्ञानिक


मैं प्रत्येक मंगलवार को शैव करने या बाल बनाने के लिए सैलून जाता हूं , या कभी-कभी सैलूनवाले को ही घर पर बुलवा लेता हूं। सेलून में जो नाई रहता है , वह गंवई रिश्ते में मुझे चाचाजी कहता है। विगत दो वषोZं से मैं उससे लागातर प्रत्येक मंगलवर को शैव करवाता आ रहा हूं। एक दिन सैलूनवाला मुझसे कहता है-`चाचाजी एक प्रश्न पूछूं ?´
मैंने कहा -` क्यों नहीं ? खुशी से पूछ सकते हो । ´
` लोग कहते हैं , आप बहुत बड़े ज्योतिषी हो ,
,लोग कहते हैं तो मैं हो सकता हूं , पर तुझे कोई संशय है क्या ? ´
` इतने बड़े ज्योतिषी होने के बावजूद आप मंगलवार को बाल या दाढ़ी बनवाते हैं। कई लोगों का कहना है कि बृहस्पतिवार को बाल बनवाने से लक्ष्मी दूर भागती है और शनिवार मंगलवार को लागातार बाल बनवाने से बहुत ही अनिष्ट होता है। एक राजा लागातार कुछ दिनों तक इन्हीं दिनों में हजामत बनवाया करता था , जिससे कुछ दिनों बाद उसकी हत्या हो गयी थी। ´
वह बोलता ही जा रहा था। उसकी बातों को सुनने के बाद मैंने कहा-` किस राजा महाराजा के साथ कौन सी घटना घटी थी , यह तो मुझे मालूम नहीं और न ही मैं मालूम करना चाहता हूं। मैने मंगलवार का दिन इसलिए चयन किया क्योंकि इस दिन अंधविश्वास के चक्कर में पड़ने से लोगों की भीड़ तुम्हारे पास नहीं होती और इसलिए तुम फुर्सत में होते हो। मुझे काफी देर तक तुम्हारा इंतजार नहीं करना होता है। मेरा काम शीघ्र ही बन जाता है। आज से बहुत दिन पहले सप्ताह के दूसरे दिनों में भी तुम्हारे पास आया था। उस समय तुम्हें फुर्सत नहीं थी , तब काफी देर मुझे अखबार पढ़कर समय काटना पड़ा था। इस तरह मेरे कीमती समय की कुछ बर्वादी हो गयी थी। अब मुझे मंगलवार को बाल कटवाने में सुविधा हो जाती है। इसलिए इस दिन के साथ समझौता कर चुका हूं , सप्ताह के दूसरे दिनों में मुझे असुविधा होती है। सुयोग उसे ही कहते हैं , जब काम आसानी से बन जाए। इन कायोZं के लिए मेरे लिए बुधवार शुभ नहीं है , क्योंकि इस दिन समय की अनावश्यक बर्वादी हो जाती है , रुटीन में व्यवधान उपस्थित होता है , काम करनें का सिलसिला बिगड़ जाता है।
समाज में देखा जाए , तो अधिकांश लोग मंगलवार और शनिवार को इस तरह के कायोZं या अन्य दिनों को अन्य किसी प्रकार के कायोZं के लिए अशुभ मानते हैं। उनका ऐसा विश्वास है कि गलत दिनों में किया गया कार्य अनिष्टकर फल भी प्रदान कर सकता है। इसे कोरा अंधविश्वास ही कहा जा सकता है , क्योंकि भले ही ग्रहों के नाम पर इन वारों का नामकरण हो गया हो ,किन्तु सच्ची बात यह है कि ग्रहों की स्थिति से इन वारों का कोई संबंध है ही नहीं। न तो रविवार को सूर्य आकाश के किसी खास भाग में होता है ,और न ही इस दिन सूर्य की गति में कोई परिवत्र्तन होता है , और न ही रविवार को सूर्य केवल धनात्मक या ऋणात्मक फल ही देता है। जब ऐसी बाते है ही नही तो फिर रविवार से सूर्य का कौन सा संबंध है ? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रविवार से सूर्य का कोई संबंध है ही नहीं । रविवार से सूर्य का संबंध दिखा पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए न केवल कठिन वरन् असंभव कार्य है। सुविधा के अनुसार किसी भी बच्चे का कुछ भी नाम रखा जा सकता है , परंतु उस बच्चे में नाम के अनुसार गुण भी आ जाएं , ऐसा नििश्चत नहीं है। यथानाम तथागुण लोगों की संख्या नगण्य ही होती है , इस संयोग की सराहना की जा सकती है पर किसी व्यक्ति का कोई नाम रखकर उसके अनुरुप ही विशेषताओं को प्राप्त करने की इच्छा रखें तो यह हमारी भूल होगी । इस बात से आम लोग भिज्ञ भी हैं , तभी ही यह कहावत मशहूर है ` ऑख का अंधा , नाम नयनसुख ´ । इसी तरह कभी-कभी पृथ्वीपति नामक व्यक्ति के पास कोई जमीन नहीं होती तथा दमड़ीलाल के पास करोड़ों की संपत्ति होती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि किसी नामकरण का कोई वैज्ञानिक अर्थ हो या नाम के साथ गुणों का भी संबंध हो , यह आवश्यक नहीं है। कोई व्यक्ति अपने पुत्र का नाम रवि रख दे तथा उसमें सूर्य की विशेषताओं की तलाश करे , उसकी पूजा कर सूर्य भगवान को खुश रखने की चेष्टा करे तो ऐसा संभव नहीं है। इस तरह न तो रविवार से सूर्य का , न सोमवार से चंद्र का , मंगलवार से मंगल का , बुधवार से बुध का , बृहस्पतिवार से बृहस्पति का , शुक्रवार से शुक्र का और न ही शनिवार से शनि का ही संबंध होता है।
इसी तरह मंगलवार का व्रत करके सुखद परिस्थितियों में मन और शरीर को चाहे जिस हद तक स्वस्थ , चुस्त , दुरुस्त या विपरीत परिस्थितियों में शरीर को कमजोर कर लिया जाए , हनुमानजी या मंगल ग्रह का कितना भी स्मरण कर लिया जाए , हनुमान या मंगल पर इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता। पूजा करने से ये खुश हो जाएंगे , ऐसा विज्ञान नहीं कहता , किन्तु पुजारी ये समझ लें और बहुत आस्था के साथ पूजापाठ में तल्लीन हो जाएं , तो मनोवैज्ञानिक रुप से इसका भले ही कुछ लाभ उन्हें मिल जाए , वे कुछ क्षणों के लिए राहत की सॉस अवश्य ले लेते हैं।
कभी कभी नामकरण विशेषताओं के आधार पर भी किया जाता है और कभी कुछ चित्रों और तालिकाओं के अनुसार किया जाता है। ऋतुओं का नामकरण इनकी विशेषताओं की वजह से है , इसे हम सभी जानते हैं। ग्रीष्मऋतु कहने से ही प्रचंड गमीZ का बोध होता है , वषाZऋतु से मूसलाधार वृिष्ट का तथा शरदऋतु कहने से उस मौसम का बोध होता है , जब अत्यधिक ठंड से लोग रजाई के अंदर रहने में सुख महसूस करें। इसी तरह माह के नामकरण के साथ भी कुछ विशेषताएं जुड़ी हुई है। आिश्वन महीने का नामकरण इसलिए हुआ , क्योंकि इस महीने में अिश्वनी नक्षत्र में पूणिZमा का चॉद होता है। बैशाख नाम इसलिए पड़ा , क्योंकि इस महीने में विशाखा नक्षत्र में पूणिZमा का चॉद होता है। इस तरह हर महीने की विशेषता भिन्न-भिन्न इसलिए हुई ,क्योंकि सूर्य की स्थिति प्रत्येक महीने आकाश में भिन्न-भिन्न जगहों पर होती है। ज्योतिषीय दृिष्ट से भी हर महीने की अलग-अलग विशेषताएं हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में उजाले और अंधेरे का अनुपात बराबर बराबर होने के बावजूद एक को कृष्ण और दूसरे को शुक्ल पक्ष कहा गया है। दोनों पक्षों के मौलिक गुणों में कोई भी अंतर नहीं होता है। बड़ा या छोटा चॉद दोनो पक्षों में होता है। अष्टमी दोनों पक्षों में होती है। किन्तु ये नाम अलग ही दृिष्टकोण से दिए गए हैं । जिस पक्ष में शाम होने के साथ ही अंधेरा हो , उसे कृष्ण पक्ष और जिस पक्ष में शाम पर उजाला रहे , उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं। शुक्ल पक्ष के आरंभ में चंद्रमा सूर्य के अत्यंत निकट होता है। प्रत्येक दिन सूर्य से उसकी दूरी बढ़ती चली जाती है और पूर्णमासी के दिन यह सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर पूर्ण प्रकाशमान देखा जाता है। इस समय सूर्य से इसकी कोणिक दूरी 180 डिग्री होती है। इस दिन सूर्यास्त से सूयोZदय तक रोशनी होती है। इसके बाद कृष्ण पक्ष का प्रारंभ होता है। प्रत्येक दिन सूर्य और चंद्रमा की कोणिक दूरी घटने लगती है। इसका प्रकाशमान भाग घटने लगता है और कृष्ण पक्ष के अंत में अमावश तिथि के दिन सूर्य चंद्रमा एक ही विन्दु पर होते हैं। सूयोZदय से सूर्यास्त तक अंधेरा ही अंधेरा होता है। इस तरह ऋतु , महीने और पक्षों की वैज्ञानिकता समझ में आ जाती है। भचक्र में सूर्य , चंद्रमा और नक्षत्र - सभी का एक दूसरे के साथ परस्पर संबंध है , किन्तु सप्ताह के सात दिनों का नामकरण ग्रहों के गुणों पर आधारित न होकर याद रख पाने की सुविधा से प्रमुख सात आकाशीय पिंडों के नाम के आधार पर किया गया लगता है , महीनें को दो हिस्सों में बॉटकर एक-एक पखवारे का शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष बनाया गया है। दोनो ही पक्ष सूर्य और चंद्रमा की वििभ्न्न स्थितियों के सापेक्ष हैं , किन्तु एक पखवारे को दो हिस्सों में बॉटकर दो सप्ताह में समझने की विधि केवल सुविधावादी दृिष्टकोण का परिचायक है। जब सप्ताह का निर्माण ही ग्रहों पर आधारित नहीं है , तो उसके अंदर आनेवाले सात अलग अलग दिनों का भी कोई वैज्ञानिक अर्थ नहीं है।
सौरमास और चंद्रमास दोनों की परिकल्पनाओं का आधार भिन-भिन्न है। पृथ्वी 365 दिन और कुछ घंटों में एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है। इसे सौर वषZ कहतें हैं, इसके बारहवें भाग को एक महीना कहा जाता है। सौरमास से अभिप्राय सूर्य का एक रािश में ठहराव या आकाश में 30 डिग्री की दूरी तय करना होता है। चंद्रमास उसे कहते हैं , जब चंद्रमा एक बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है। यह लगभग 29 दिनों का होता है । बारह महीनों में बारह बार सूर्य की परिक्रमा करने में चंद्रमा को लगभग 354 दिन लगते हैं। इसलिए चंद्रवषZ 354 दिनों का होता है। सौर वष्र और चंद्रवषZ के सवा ग्यारह दिनों के अंतर को प्रत्येक तीन वषोZं के पश्चात् चंद्रवषZ में एक अतिरिक्त महीनें मलमास को जोड़कर पाट दिया जाता है। सौर वषZ में भी 365 दिनों के अतिरिक्त के 5 घंटों को चार वषे बाद लीप ईयर वषZ में फरवरी महीने को 29 दिनों का बनाकर समन्वय किया जाता है , किन्तु सप्ताह के सात दिन , जो पखवारे के 15 दिन , महीने के 30 दिन , चांद्रवषZ के 354 दिन और सौर वषZ के 365 दिन में से किसी का भी पूर्ण भाजक या अपवत्र्तांक नहीं है , के समन्वय या समायोजन का ज्योतिष शास्त्र में कहीं भी उल्लेख नहीं है , जिससे स्वयंमेव ही ज्योतिषीय संदर्भ में सप्ताह की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है। अत: मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रविवार को सूर्य का , सोमवार को चंद्र का , मंगलवार को मंगल का , बुधवार को बुध का , बृहस्पतिवार को बृहस्पति का , शुक्रवार को शुक्र का तथ शनिवार को शनि का पर्याय मान लेना एक बहुत बड़ी गल्ती है। ग्रहों का सप्ताह के सातो दिनों से कोई लेना-देना नहीं है।
सात दिनों का सप्ताह मानकर पक्ष को लगभग दो हिस्सों में बॉटकर सात दिनों के माध्यम से सातो ग्रहों को याद करने की चेष्टा की गयी होगी। लोग कभी यह महसूस नहीं करें कि ग्रहों का प्रभाव नहीं होता ।शायद इसी शाश्वत सत्य के स्वीकर करने और कराने के लिए ऋषि मुनियो द्वारा सप्ताह के सात दिनों को ग्रहों के साथ जोड़ना एक बड़े सूत्र के रुप में काम आया हो। एक ज्योतिषी होने के नाते सप्ताह के इन सात दिनों से मुझे अन्य कुछ सुविधाएं प्राप्त हैं। आज मंगलवार को चंद्रमा सिंह रािश में स्थित है , तो बिना पंचांग देख ही यह अनुमान लगाना संभव है कि आगामी मंगलवार को चंद्रमा वृिश्चक रािश में , उसके बाद वाले मंगलवार को कुंभ रािश में तथ उसके बादवाले मंगलवार को वृष रािश में या उसके अत्यंत निकट होगा। इस दृिष्ट से चंद्रमा की भचक्र में 28 दिनों का चक्र मानकर इसे 4 भागों में बॉट दिया गया हो तो हिसाब सुविधा की दृिष्ट से अच्छा ही है। मंगलवार को स्थिर रािश में चंद्रमा है तो कुछ सताहों तक आनेवाले मंगलवार को चंद्रमा स्थिर रािश में ही रहेगा। कुछ दिनों बाद चंद्रमा द्विस्वभाव रािश में चला जाएगा तो फिर कुछ सप्ताहों तक मंगलवार को चंद्रमा द्विस्वभाव रािश में ही रहेगा।
मैं वैज्ञानिक तथ्यों को सहज ही स्वीकार करता हूं। पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग और करण की चर्चा रहती है। ये सभी ग्रहों की स्थिति पर आधारित हैं। किसी ज्योतिषी को बहुत दिनों तक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया जाए , ताकि महीने और दिनों के बीतने की कोई सूचना उसके पास नहीं हो । कुछ महीनों बाद जिस दिन उसे आसमान को निहारने का मौका मिल जाएगा , केवल सूर्य और चंद्रमा की स्थिति को देखकर वह समझ जाएगा कि उस दिन कौन सी तिथि है , कौन से नक्षत्र में चंद्रमा है , सामान्य गणना से वह योग और करण की भी जानकारी प्राप्त कर सकेगा , किन्तु उसे सप्ताह के दिन की जानकारी कदापि संभव नहीं हो पाएगी , ऐसा इसलिए क्योंकि सूर्य , चंद्रमा या अन्य ग्रहों की स्थिति के सापेक्ष सप्ताह के सात के दिनों का नामकरण नहीं है।

रविवार, २१ सितम्बर २००८

राहू-केतु का फलित पर कोई प्रभाव नहीं


भौतिक विज्ञान किसी पिंड के सापेक्ष या उसके अस्तित्व के कारण गुरुत्वाकषZण , विद्युत-चुम्बकीय-क्षेत्र , या अन्य रुपांतरित शक्ति के स्वरुपों की व्याख्या करता है। जहॉ पिंड नहीं है , किसी प्रकार कीे शक्ति के अस्तित्व में होने की बात कही ही नहीं जा सकती। राहू-केतु आकाश में किसी पिंड के रुप में नहीं हैं। अत: इसमें अंतिर्नहित और उत्सर्जित शक्ति को स्वीकार किया ही नहीं जा सकता है । फलित ज्योतिष में राहूकेतु को कष्टकारक ग्रह कहा गया है , इससे लोग पीिड़त होते हैं। ज्योतिषियों ने इसके भयावह स्वरुप का वर्णन कर धर्मशास्त्र में उिल्लखित भगवान विष्णु की तरह ही इनके साथ उचित न्याय नहीं किया है। हमारे धर्मग्रंथों में जैसा उल्लेख है , छल से देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृतपान करते हुए राक्षस का वध श्रीविष्णु ने सुदशZनचक्र से कर दिया राक्षस के गर्दन का उपरी भाग राहू और नीचला भाग केतु कहलाया। भगवान नें ऐसा करके राक्षसी गुणों का प्रकारांतर में वध ही कर दिया था। किन्तु ज्योतिषी आज भी उसे जीवित समझते हैं और उसके भयावह स्वरुप का वर्णन करके यजमानों को भयभीत करते हैं। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के समय ही इनके असाधारण स्वरुप को देखकर लोगों के मस्तिष्क में यह बात कौध गयी हो कि सूर्य और चंद्रमा जैसे प्रभावशाली , प्रकाशोत्पादक , आकाशीय पिंडों के देदीप्यमान स्वरुप को निस्तेज करनेवाले ग्रहों की दुष्टता और विध्वंसात्मक प्रवृत्ति को कैसे अस्वीकार कर लिया जाए , किन्तु मेरा दृिष्टकोण यहॉ बिल्कुल ही भिन्न है। दो मित्र परस्पर टकराकर लहुलूहान हो जाएं , घायल हो जाएं ,तो इसमें उस जगह का क्या दोष , जहॉ इस प्रकार की घटना घट गयी हो। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण यदि असाधारण घटनाएं हैं , तो इसके समस्त फलाफल की विवृत्ति सूर्य चंद्र तक ही सीमित हो , क्योंकि ये शक्तिपृंज या शक्ति के स्रोत हैं। चंद्रग्रहण के समय पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और सूर्यग्रहण के समय चंद्रमा के कारण सूर्य आंिशक तौर पर या पूर्ण रुप से नहीं दिखाई पड़ता है। इस प्रकार के ग्रहण राहू केतु रेखा पर सूर्यचंद्र के पहुंचने के कारण होते हैं। इस प्रकार के ग्रहणों से किसकी शक्ति घटी और किसकी बढ़ी ,उसका मूल्यांकण किया जाना चाहिए। राहू केतु जैसे विन्दुओं को शक्ति का स्रोत समझ लेना , उन परिकल्पित विन्दुओं की शक्ति और विशेषताओं को भचक्र के किसी भाग से जोड़ देना तथ व्यक्तिविशेष के जीवन के किसी भाग से इसके मुख्य प्रतिफलन काल को जोड़ने की परिपाटी वैज्ञानिक दृिष्ट से उचित नहीं लगती। चंद्रमा का परिभ्रमणपथ पृथ्वी के चतुिर्दक बहुत ही छोटा है। इसकी तुलना में सूर्य के चतुिर्दक पूथ्वी का परिभ्रमणपथ बहुत ही विशाल है। यदि पृथ्वी को स्थिर मान लिया जाता है , तो चंद्रपथ की तुलना में सूर्य का काल्पनिक परिभ्रमण पथ नििश्चत रुप से बड़ा हो जाएगा। परिकल्पना यह है कि चंद्रमा और सूर्य के परिभ्रमण पथ एक दूसरे को काटते हैं , उसमें से एक विन्दु उत्तर की ओर तथा दूसरा दक्षिण की ओर झुका होता है। दोनों के परिभ्रमणपथ परिधि की दृिष्ट से एक दूसरे से काफी छोटे-बड़े हैं ,अत: इनके परस्पर कटने का कोई प्रश्न ही नहीं उपस्थित होता है , किन्तु दोनो के परिभ्रमण पथ को बढ़ाते हुए नक्षत्रों की ओर ले जाया जाए तो दोनो का परिभ्रमणपथ आकाश में दो विन्दुओं पर अवश्य कटता है। इस तरह चंद्रसूर्यपथ के कटनेवाले दोनो विन्दुओं उत्तरावनत् और दक्षिणावनत् का नाम क्रमश: राहू और केतु है। इस तरह येे काल्पनिक विन्दु आकाश में कितनी दूरी पर है , इसका भी सही बोध नहीं हो पाता। पुन: अस्तित्व की दृिष्ट से विन्दु विन्दु ही है , इसकी न तो लंबाई है , न चौड़ाई और न ही मोटाई , इसलिए पिंड के नकारात्मक अस्तित्व तथा दूरी की अनििश्चतता के कारण फलित में राहू केतु का महत्व समीचीन नहीं लगता। किन्तु ये सूर्य और चंद्रग्रहण काल को समझने में सहायक हुए , इसलिए इन्हें ग्रह का दर्जा दे दिया गया। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सूर्य चंद्रमा की युति और वियुति से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। यह युति वियुति खास इसलिए मानी जा सकती है या तीव्रता में वृिद्ध की संभावना रहती है , क्योंकि यह राहूकेतु रेखा पर होती है , जो पृथ्वी के केन्द्र से होकर गुजरती है , किन्तु इस प्रकार की आकाशीय घटनाएं बहुत बार घटती हैं। सूर्य बुध और सूर्य शुक्र के ग्रहणों को भी देख चुका हूं , किन्तु इसके विशेष फलित की चर्चा युति से अधिक कहीं भी नहीं हुई है। यदि इन विशेष युतियों पर भी बात हो , इनके फलित को उजागर करने की बात हो तो आकाश में राहू केतुओ की संख्या ग्रहों से भी अधिक हो जाएगी। आकाशीय पिंडों से संबंधित भौतिक विज्ञान जिन शक्तिसिद्धांतों पर काम करता है , उन्हीं का उपयोग करके सही फल प्राप्त किया जा सकता है। राहू केतु परिकल्पित आकाशीय विन्दु हैं , अत: आकाशीय िंपड की तरह इसके फल को स्वीकार नहीं किया जा सकता।


राहू केतु को ग्रह न मानकर फलित ज्योतिष से इनकी छुट्टी कर दी जाए तो विंशोत्तरी पद्धति में वणिZत राहू केतु के महादशा और अंतर्दशा का क्या होगा ? ठंडे दिमाग से काम लें तो जो राहू केतु सूर्य और चंद्र का भक्षण कर रहा था , एस्ट्रोफिजिक्स के सिद्धांत आज उसी का भक्षण कर रहें हैं। जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा के परिभ्रमणपथों के दो विन्दुओं पर कटने से उन परिकल्पित विन्दुओं के नाम राहू केतु पड़े , इस तरह सूर्य बुध , सूर्य शुक्र , सूर्य मंगल , सूर्य बृहस्पति , सूर्य शनि , पुन: चंद्र बुध , चंद्र मंगल , चंद्र शुक्र ,चंद्र बृहस्पति , चंद्र शनि , के परिभ्रमण पथ भी दो विन्दुओं पर कट सकते हैं , इन परिस्थितियों में इन परिकल्पित विन्दुओं के नाम राहू1 , राहू2 ,राहू3 ,,,,,,,,,,,,,,तथा केतु1 , केतु2 , केतु3 ,,,,,,,,,,,,,पड़ते चले जाएंगे। सूर्यपथ के साथ सभी ग्रहों के परिभ्रमण पथ के कटने से 9 राहू केतुओं का , चंद्रपथ के साथ अन्य ग्रहों के कटने से 8 राहू केतुओं का , इस तरह बुध के परिभ्रमण पथ पर 7 , मंगल के परिभ्रमण पथ पर 6,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। इस तरह यह सिद्ध हेा जाता है कि सूर्य चंद्रमा के एक ही तल में युति-वियुति ,जो पृथ्वी तल के समकक्ष होती है , की ही तरह शेष ग्रहों की युति-वियुति की संभावनाएं 44 बार बनती है। इस तरह अनेकानेक यानि 45 राहू केतुओं का आविभाZव हो जाएगा। यहॉ ध्यान देने योग्य बात ये है कि इन विशेष परिस्थितियों में युति या वियुति बनानेवाले ग्रह तत्काल या कालान्तर में अपने दशाकाल में सचमुच असाधारण परिणाम प्रस्तुत करते हैं। इन विशेष विन्दुओं के ठीक 90 डिग्री की दूरी पर दोनो तरफ दोनो के परिभ्रमणपथ सर्वाधिक दूरी पर होंगे। उस समय संबंधित दोनो ग्रहों की युति या वियुति का अर्थ ग्रहण काल की युति-वियुति के विपरीत किस प्रकार का फल प्रदान करेंगे , यह परीक्षण का विषय होना चाहिए। हर दो ग्रहों के विभिन्न परिभ्रमणपथ परस्र एक दूसरे कों काटे तो उन विन्दुओं पर उनकी युति-वियुति के फलित से 90 डिग्री की दूरी पर युति-वियुति के फलित की विभिन्नता को समझने और परीक्षण करने का दायित्व ज्योतिषियों के समक्ष उपस्थित होता है। तब ही राहू केतु विन्दुओं पर ग्रहों की युति-वियुति की विशेषताओं की पकड़ की जा सकती है। पृथ्वी सूर्य के चतुिर्दक परिक्रमा करती है , किन्तु जब पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य की परिक्रमा को गौर से देखा जाए तो इसका कभी उत्तरायण और कभी दक्षिणायण होना बिल्कुल ही नििश्चत है। इसी तरह सभी ग्रहों के परिभ्रमणपथ की नियमावलि प्राय: सुनििश्चत है। ये सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं , अपने पथ पर थिरकते हुए भले ही ये उत्तर-दक्षिण आवर्ती हो जाएं , क्योंकि पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य स्वयं उत्तरायन-दक्षिणायन होता प्रतीत होता है । सभी ग्रहों की गति भिन्न-भिन्न होती है अत: विभिन्न ग्रहों के पथ मेंं विचलन परिभाषित होता रहता है। इस प्रकार किसी भी दो ग्रहों की युति-वियुति पृथ्वी तल समानांतर एक तल में एक विंदु पर या 180 डिग्री पर होती रहती है। सूर्य और चंद्रमा कब राहू केतु विंदु पर युति या वियुति करेंगे , इसकी नियमितता की जानकारी प्राप्त हे चुकी है , किन्तु शेष ग्रहों से संबंधित राहू केतु विंदुओं की गति की नियमितता की जानकारी गणित ज्योतिष के मर्मज्ञ ही दे सकते हैं । जनसामान्य तक इसकी जानकारी की आवश्यकता इसलिए महसूस नहीं की गयी क्योंकि शेष ग्रहों के ग्रहण न तो आकषZक होते हैं और न ही दृिष्टपटल में आ ही पाते हैं। फलित ज्योतिष में भी इसकी चर्चा युति के रुप में ही होती है , ग्रहण के रुप में नही। पृथ्वी के बहिर्कक्षीय ग्रह मंगल , बृहस्पति , शनि , यूरेनस , नेपच्यून और प्लूटो सूर्य से ग्रहण के बावजूद सूर्य के पृष्ठतल में ही रहेंगे , अत: ये पृथ्वी से दृष्ट नहीं हो सकते। अनेक राहू केतुओं की चर्चा करके मैं यही सिद्ध करना चाह रहा हूं कि फलित ज्योतिष में वणिZत इसके भयानक स्वरुप को लोग भूल जाएं। किसी भी दो ग्रहों के लिए ये ऐसे परिकल्पित विन्दु हैं , जहॉ पहुंचने पर इन दोनों आकाशीय पिंडों के साथ ही साथ पृथ्वी एक सीधी रेखा में होता है। इन विन्दुओं पर संबंधित ग्रहों के एक बार पहुंच जाने पर उन ग्रहों की शक्ति में भले ही कमी या वृिद्ध देखी जाए , किन्तु इस परिप्रेक्ष्य में राहू केतु के प्रभाव को अलग से दर्ज करना कदापि उचित नहीं लगता। पहले एक राहू और एक केतु से ही लोग इतने भयभीत होते थे , अब 45 राहू और केतु की चर्चा कर मैं लोगों को डराने की चेष्टा नहीं कर रह हूं , वरन् इसके माध्यम से असलियत को समझाने की चेष्टा कर रहा हूं , इस विश्वास के साथ कि इसकी जानकारी के बाद इसके जानकार इसका दुरुपयोग नहीं करेंगे। अब वे दिन लद गए , जब राहू केतु के गुणों के आधार पर भचक्र के रािशयों या नक्षत्रों पर इसके स्वामित्व की चर्चा होती थी। इनके उच्च या नीच रािश की चर्चा की जाती थी। इनके नाम पर महादशा और अंतर्दशा की चर्चा होती थी। सभी प्रकार की दशापद्धतियों में इनके प्रभाव की हिस्सेदारी सुनििश्चत की जाती थी। राहू केतु के सही स्वरुप कों समझ लेने के बाद यह दायित्व हम ज्योतिषियों के समक्ष उपस्थित होता है कि विभिन्न दशापद्धतियों , चाहे वह विंशोत्तरी हो या अष्टोत्तरी या परंपरागत , राहू केतु के महादशा के काल भिन्नता 18 वषZ और 7 वषZ के साथ ही साथ महादशा और अंतर्दशा आदि से संबंधित त्रुटियों को कैसें समाप्त किया जा सकेगा ? पंचांग निर्माणकत्र्ताओं को यह स्मरण होगा कि श्री संवत् 2050 शक 1915 कार्तिक कृष्ण सप्तमी शनिवार 6 नवंबर 1993 को सूर्य-बुध की भेद-युति हुई थी। इसे सूर्य बुध का ग्रहण कहा जा सकता है। भला राहू केतु के अभाव में कोई ग्रहण संभव है ?